सामूहिक संदेश देने का पुराना लेकिन प्रभावी जरिया रहा है नुक्कड़ नाटक। मनोरंजन की चादर तले गंभीर विषयों पर संदेश, चिंतन और मनन का ऐसा मंच जिसने कई सदियों से अपनी अलग पहचान बना रखी है। मजलूमों, गरीबों की आवाज बना नुक्कड़ नाटक का समय के साथ रूप भी बदला और ढंग भी।
रंगमंच-सिनेमा के दौर में भले ही अब इसका दायरा भी कुछ सिमट सा गया है लेकिन कला साहित्य और संस्कृति की भूमि काशी में नुक्कड़ नाटक पूरी जिंदादिली से मुस्कुरा रहा है। गली मोहल्ले, घाट चौराहे पर नुक्कड़ नाटकों का जादू अब भी कायम है।
बनारस में कई संस्थाएं भी इसमें निष्ठा और समर्पण से जुटी हैं। आज राष्ट्रीय नुक्कड़ नाटक दिवस है और इस मौके पर यहां की अनूठी परंपरा से आपका साक्षात्कार कराते हैं...।
नुक्कड़ नाटक के क्षेत्र में प्रेरणा है कला मंच
थिएटर आर्टिस्ट सफदर हाशमी को प्रेरणा मानकर आज से पच्चीस साल पहले काशी में प्रेरणा कला मंच की स्थापना हुई थी। आज नुक्कड़ नाटक के क्षेत्र में यही कला मंच प्रेरणा बन चुका है। प्रेरणा कला मंच ने अपने ढाई दशक के सफर में 7,200 से अधिक नुक्कड़ नाटकों की प्रस्तुतियां देश भर में दी है।
56 नुक्कड़ नाटक उनके द्वारा तैयार हैं। श्रीलंका से लेकर मेडागास्कर में नुक्कड़ नाटक को जीवंत करने का श्रेय भी काशी को ही जाता है। इसी मंच के जरिये ही काशी से पूर्वोत्तर तक नुक्कड़ नाटक की कला परवान चढ़ी।
पूर्वोत्तर में लोग जानते भी नहीं थे कि आखिर नुक्कड़ नाटक, स्ट्रीट प्ले है क्या, आज वहां सैकड़ों नुक्कड़ नाटक खेले जा रहे हैं। यहीं से प्रशिक्षण पाकर ही बनारस में लोगोें ने अपनी कई संस्थाएं शुरू कर दी हैं।
निदेशक फादर आनंद कहते हैं नुक्कड़ नाटक दरअसल मजलूमों की आवाज है। गलत व्यवस्था के खिलाफ आवाज है। ये बात अलग है कि आज नुक्कड़ नाटक कारपोरेट व सरकार के प्रचार तंत्र बन गए हैं। इससे नुक्कड़ नाटक की आत्मा खत्म होने का भय है। थिएटर तक जाने का एक माध्यम तो नुक्कड़ नाटक हो सकता है लेकिन कॅरियर नहीं। नुक्कड़ नाटक के लिए सामाजिक प्रतिबद्धता जरूरी है, जुनून जरूरी है।