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राष्ट्रीय नुक्कड़ नाटक दिवस खासः मनोरंजन के पीछे गंभीर संदेश सुनाता है ‘नुक्कड़ नाटक’

Thu, 12 Apr 2018 06:00 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
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नुक्कड़ नाटक - फोटो : अमर उजाला
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सामूहिक संदेश देने का पुराना लेकिन प्रभावी जरिया रहा है नुक्कड़ नाटक। मनोरंजन की चादर तले गंभीर विषयों पर संदेश, चिंतन और मनन का ऐसा मंच जिसने कई सदियों से अपनी अलग पहचान बना रखी है। मजलूमों, गरीबों की आवाज बना नुक्कड़ नाटक का समय के साथ रूप भी बदला और ढंग भी।
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रंगमंच-सिनेमा के दौर में भले ही अब इसका दायरा भी कुछ सिमट सा गया है लेकिन कला साहित्य और संस्कृति की भूमि काशी में नुक्कड़ नाटक पूरी जिंदादिली से मुस्कुरा रहा है। गली मोहल्ले, घाट चौराहे पर नुक्कड़ नाटकों का जादू अब भी कायम है।

बनारस में  कई संस्थाएं भी इसमें निष्ठा और समर्पण से जुटी हैं। आज राष्ट्रीय नुक्कड़ नाटक दिवस है और इस मौके पर यहां की अनूठी परंपरा से आपका साक्षात्कार कराते हैं...। 
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नुक्कड़ नाटक के क्षेत्र में प्रेरणा है कला मंच
थिएटर आर्टिस्ट सफदर हाशमी को प्रेरणा मानकर आज से पच्चीस साल पहले काशी में प्रेरणा कला मंच की स्थापना हुई थी। आज नुक्कड़ नाटक के क्षेत्र में यही कला मंच प्रेरणा बन चुका है। प्रेरणा कला मंच ने अपने ढाई दशक के सफर में 7,200 से अधिक नुक्कड़ नाटकों की प्रस्तुतियां देश भर में दी है।

 

56 नुक्कड़ नाटक उनके द्वारा तैयार हैं। श्रीलंका से लेकर मेडागास्कर में नुक्कड़ नाटक को जीवंत करने का श्रेय भी काशी को ही जाता है। इसी मंच के जरिये ही काशी से पूर्वोत्तर तक नुक्कड़ नाटक की कला परवान चढ़ी।

 

पूर्वोत्तर में लोग जानते भी नहीं थे कि आखिर नुक्कड़ नाटक, स्ट्रीट प्ले है क्या, आज वहां सैकड़ों नुक्कड़ नाटक खेले जा रहे हैं। यहीं से प्रशिक्षण पाकर ही बनारस में लोगोें ने अपनी कई संस्थाएं शुरू कर दी हैं। 


निदेशक फादर आनंद कहते हैं नुक्कड़ नाटक दरअसल मजलूमों की आवाज है। गलत व्यवस्था के खिलाफ आवाज है। ये बात अलग है कि आज नुक्कड़ नाटक कारपोरेट व सरकार के प्रचार तंत्र बन गए हैं। इससे नुक्कड़ नाटक की आत्मा खत्म होने का भय है। थिएटर तक जाने का एक माध्यम तो नुक्कड़ नाटक हो सकता है लेकिन कॅरियर नहीं। नुक्कड़ नाटक के लिए सामाजिक प्रतिबद्धता जरूरी है, जुनून जरूरी है। 

‘मैसक्यूरेड्स’ के जरिये आईआईटी की सोशल इंजीनियरिंग

theatre - फोटो : अमर उजाला
मैथ के कैलकुलेशन, केमिस्ट्री के फार्मूले और इंजीनियरिंग के गूढ़ रहस्यों से रूबरू होने वाले भावी इंजीनियर्स ने भी सोशल इंजीनियरिंग के लिए नुक्कड़ नाटक का ही सहारा लिया है। आईआईटी बीएचयू में ‘मैसक्यूरेड्स’ नाम से एक ड्रामा की सोसाइटी आठ साल पहले बनाई और इनका पूरा फोकस नुक्कड़ नाटक ही रहता है।

बनारस समेत देश भर के कई कॉलेज में आईआईटी की इस टीम ने नुक्कड़ नाटक किया है। जीवन संध्या, आप शुतुरमुर्ग हैं, नैतिकता की सरकार, अन्नदाता जैसे कई नुक्कड़ नाटक मैसक्यूरेड्स ने किए हैं। बीटेक थर्ड ईयर गुरदीप सिंह बताते हैं कि चाहे भ्रष्टाचार हो, समाज को आईना दिखाना हो, कम समय में अपनी बात को दूसरों तक पहुंचाने का इससे सशक्त माध्यम कोई दूसरा नहीं। 

इसी तरह युवाओं की एक और संस्था दिशा क्रिएशन भी नुक्कड़ नाटक का मंचन शहर और शहर के बाहर कर रही है। दिशा क्रिएशन के नवीन मिश्रा बताते हैं कि उन्होंने अब करीब दस हजार से अधिक नुक्कड़ नाटकों का मंचन किया है। नुक्कड़ नाटक और नाटक के जरिये ही इस संस्था से जुड़े कलाकारों का खर्च भी चलता है। 

सफदर हाशमी की याद में नुक्कड़ नाटक दिवस
जाने माने थिएटर कलाकार की याद में राष्ट्रीय नुक्कड़ नाटक दिवस मनाया जाता है। 12 अप्रैल को उनके जन्म दिवस को इस दिवस के नाम किया गया है। भारत में आधुनिक नुक्कड़ नाटक को लोकप्रिय बनाने का श्रेय सफदर हाशमी को ही जाता है। 
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सच से रूबरू करा गया मुखौटे का सच

नाटक का चक्कर ने दर्शकों को खूब गुदगुदाया - फोटो : अमर उजाला
बाजार के गणित और व्यवसायीकरण के नाम पर होने वाले शोषण से परेशान और त्रस्त एक लेखक, गीतकार और संगीतकार के जीवन के सच को मंच पर जीवंत किया गया। बुधवार को सनबीम वरुणा के मंच पर सेतु सांस्कृतिक कें द्र की नाट्य प्रस्तुति मुखौटे के सच के माध्यम से नाट्यकर्मियों ने जीवन के  सच को उकेरने का प्रयास किया।

उर्दू, अरबी और फारसी विद्वान डा. अमृत लाल इशरत मधोक की स्मृति में राष्ट्रीय नाट्य आंदोलन शुरू हुआ। बुधवार को राष्ट्रीय नाट्य आंदोलन की पहली प्रस्तुति में मुखौटे के सच नाटक ने दर्शकों को नाट्यकर्मियों के वास्तविक जीवन से परिचित कराया।

आकाश श्रीवास्तव के लेखन एवं निर्देशन से सजे नाटक में कलाकारों ने सधे हुए अभिनय से दर्शकों को अंत तक बांधे रखा। दूसरी प्रस्तुति हास्य नाटक नाटक का चक्कर ने तो दर्शकाें को हास्य के रस से सराबोर कर दिया। इसमें पति-पत्नी के बीच विचारों की जंग और एक नाटककार के नाटक करने की जिद को हास्य के पुट के साथ मंच पर कलाकारों ने पेश किया। इप्टा वाराणसी की हास्य प्रस्तुति नाटक का चक्कर के लेखक दिनेश भारती और निर्देशक सलीम राजा रहे। 
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