फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

राष्ट्रीय जेवलिन दिवस: मां के गहने गिरवी रख खरीदे जूते, कपड़ा डालकर पहनते थे; इस खिलाड़ी ने पदक जीत बढ़ाया मान

Wed, 07 Aug 2024 10:34 AM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News: भालाफेंक को लेकर राष्ट्रीय खिलाड़ी आशीष सिंह ने अमर उजाला के साथ अपने संघर्ष को साझा किया। कई प्रतियोगिताओं को जीतकर इन्होंने काशी का नाम रौशन किया है।
विज्ञापन
राष्ट्रीय खिलाड़ी आशीष सिंह। - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

मेरे पास स्पाइक शूज खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। एक सीनियर से सेकेंड हैंड जूता खरीदा। किट के लिए मां के गहने गिरवी रखने पड़े। भालाफेंक के प्रति दीवानगी ऐसी थी कि दोपहर में ही मैदान में पहुंच जाता था। राष्ट्रीय प्रतियोगिता में खेलने के लिए लगातार सात घंटे अभ्यास करता था। उक्त बातें राष्ट्रीय खिलाड़ी आशीष सिंह ने राष्ट्रीय जेवलीन दिवस पर बातचीत के दौरान कहीं। 

विज्ञापन




लालपुर स्टेडियम में अभ्यास करने वाले आशीष ने बताया कि कोई एक दिन में राष्ट्रीय खिलाड़ी नहीं बनता। मैदान पर खुद को तपाना पड़ता है। हरहुआ के मंसापुर निवासी राष्ट्रीय खिलाड़ी आशीष सिंह के पिता संजय सिंह बस चलाते हैं। मां रंजना सिंह गृहिणी हैं। कड़ी मेहनत और लगातार अभ्यास के दम पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतकर काशी का नाम रोशन किया।
विज्ञापन


आशीष ने शुरुआत 2012 में यूपी कॉलेज से की। इसके बाद अलग-अलग प्रतियोगिताओं में आठ से अधिक स्वर्ण पदक जीते। अखिल भारतीय विश्वविद्यालयीय प्रतियोगिता में दो बार स्वर्ण पदक जीता। पहली बार 2013 में स्वर्ण पदक जीता को मां और पिता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। 

बताया कि दिन में पढ़ाई और शाम को अभ्यास करता था। 2014 से नियमित खेलना शुरू किया। 2015 में ब्रुनई में चैंपियनशिप अक्तूबर में खेलने गया। वहां से गोल्ड जीतकर लौटा। वहां जाने के लिए सेकेंड हैंड जूते खरीदे जो कि एक नंबर बड़ा था। अपने साइज का बनाने के लिए अंदर कपड़े ठूस कर उसे पहनता था। अब समय बदल चुका है। आशीष रेलवे के लिए छह स्वर्ण पदक जीत चुके हैं।

विज्ञापन

अपने कोच चंद्रभान यादव के साथ आशीष सिंह। - फोटो : अमर उजाला
पहली बार भालाफेंक टीम में चयन, जीता स्वर्ण
2013 में इंटरमीडिएट में वॉलीबॉल खेलता था। स्कूली खेलों के लिए जेवलिन थ्रो का ट्रायल चल रहा था। लोगों को भाला फेंकते देखा तो खुद भी लाइन में लग गया। कोच ने कहा भाला फेंक पाओगे, क्या यह संभलेगा तुमसे। मैंने कहा फेंकने दीजिये नहीं फेंक पाया तो बाहर कर दीजिएगा। पहली बार भाला फेंका और सभी खिलाड़ियों से दूर फेंक दिया। इस पर सभी खुश हुए और स्कूली खेलों के लिए चुन लिया गया। प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें