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National Handloom Day: काशी में 10 साल में पांच हजार से घटकर रह गए 900 हथकरघा बुनकर, महंगाई और पावरलूम की मार

Fri, 07 Aug 2026 05:14 PM IST
Pragati Chand अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

National Handloom Day: बनारसी हथकरघा पर संकट गहराता जा रहा है। वजह है महंगाई और पावरलूम। यही वजह है कि पिछले 10 साल में पांच हजार से घटकर 900 हथकरघा बुनकर रह गए हैं।
 
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हथकरघा बुनकर - फोटो : अमर उजाला
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वाराणसी जिले के हथकरघा बुनकरों के उत्पाद को बाजार नहीं मिल रहा है। यही वजह है कि बीते दस साल में हथकरघा बुनकरों की संख्या 5000 से घटकर मात्र 900 हो गई है। लोहता, बजरडीहा, सरैया, शैलपुत्री, सुजाबाद, रामनगर समेत अन्य इलाकों में अब गिने चुने बुनकर ही रह गए हैं, जो बड़ी मुश्किल से अपनी रोजी रोटी चला रहे हैं।

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बुनकर दस्तकार मंच के प्रदेश अध्यक्ष इदरीस अंसारी का कहना है कि भाड़ा बढ़ने होने से लागत बढ़ गई है और सामान भी महंगा हो गया है। नक्खीघाट के बुनकर मनोज जायसवाल बताते हैं कि हथकरघा पर साड़ियों के अलावा दुपट्टे, स्टोल, ड्रेस मटेरियल, सिल्क कुर्ता-पायजामा फैब्रिक, होम फर्निशिंग और सजावटी वस्त्र आदि बनाए जाते हैं। अब इनमें से 90 प्रतिशत सामान पावरलूम पर बनते हैं। इसकी वजह से भी हथकरघा बुनकरों की संख्या कम हो रही हे। 

मदनपुरा के बुनकर वाजिद अंसारी बताते हैं कि हथकरघा के लिए कच्चा माल बाहर से आने के कारण भी साड़ियों की कीमतें बढ़ जाती हैं। वाराणसी में सूरत से सिंथेटिक धागा मंगाया जाता है। वहीं, कर्नाटक और चीन से ताना-बाना मंगाया जाता है।
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महंगाई ने बढ़ाई मुसीबत
बजरडीहा के आलम अंसारी बताते हैं कि 2016 में ताना-बाना 3000-4000 रुपये किग्रा मिलता था। अब उसकी कीमत बढ़कर 8-10 हजार रुपये किलोग्राम हो गई है। एक सामान्य डिजाइन वाली साड़ी बनाने में 250-300 ग्राम ताना-बाना खर्च होता है। इसकी लागत 12 हजार रुपये तक पहुंचती है और 15 हजार रुपये तक थोक विक्रेताओं को मिलती है। इसी डिजाइन की गुजरात की साड़ी 4-5 हजार रुपये में बड़ी आसानी से मिल जाती है। 

इस वजह से भी हथकरघा के कारोबार में गिरावट आ रही है।बुनकर नेता इदरीस अंसारी ने बताया कि 20 साल बाद बुनकरों की मांग को सरकार धरातल पर लेकर आई है। रमना में संत कबीर टेक्सटाइल पार्क पर काम चल रहा है। इससे बुनकरों की स्थिति सुधरने की उम्मीद है।

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