तीन साल में बेटियों का जन्म का आंकड़ा
2018 42248
2019 43533
2020 43573
(स्वास्थ्य विभाग की ओर से दर्ज आंकड़े)
बेटों के मुकाबले बेटियों का अनुपात
वर्ष बालक बालिका
2018 1000 925
2019 1000 924
2020 1000 926
बेटियों के लिए हैं ये योजनाएं
-सुकन्या समृद्धि योजना
-बालिका समृद्धि योजना
-कन्या सुमंगला योजना
-भाग्य लक्ष्मी योजना
-सीबीएसई छात्रवृत्ति योजना
यह सुखद है कि बेटियों का जन्म प्रतिशत बढ़ रहा है। विभाग की ओर से चलाई जाने वाली योजनाओं के माध्यम से भी बेटी बचाने के प्रति लोगों को जागरूक किया जाता है। बेटियों के स्वास्थ्य पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। -डॉ.एके मौर्या, प्रभारी सीएमओ
जल्द दिखेंगे सकारात्मक परिणाम
लोगों की सोच में भी बदलाव आ रहा है। इसका सकारात्मक परिणाम जल्द ही देखने को मिलेगा। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान के साथ ही कई आकर्षक उपहार भी बेटियों के जन्म पर मिलने लगे हैं। समाज में अब भी बहुत से ऐसे लोग हैं, जिनके सोच को बदलना बहुत जरूरी है। कुछ लोग बेटा-बेटी को बराबर मानने वाले हैं। लेकिन एक वर्ग ऐसा भी है जो बेटियों को बोझ मानता है। एकीकृत सोच होना बहुत जरूरी है। इसकी शुरुआत कहीं और से नहीं बल्कि परिवार से ही करनी होगी। -प्रो. श्वेता प्रसाद, समाजशास्त्र विभाग, बीएचयू
पीसीपीएनडीटी एक्ट का कड़ाई से हो रहा पालन
बेटों के मुकाबले बेटियों का अनुपात बढ़ना बड़ी खुशखबरी है। खासकर इस परिस्थिति में जब कुछ लोग बेटियों को बोझ मानते हैं। पहले जहां अस्पतालों, जांच केंद्रों पर कन्या भ्रूण की जांच हो जाती थी, वहीं अब इस पर रोक लगाने के लिए पीसीपीएनडीटी एक्ट(पूर्व गर्भाधान और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम) का कड़ाई से पालन होने लगा है। शायद यही वजह है कि अब बेटियों का जन्म प्रतिशत भी बढ़ रहा है। -डॉ. शिप्रा धर, स्त्री रोग विशेषज्ञ
दो बेटियों के बाद ही करा ली नसबंदी
परिवार नियोजन के लिए दो बच्चों के जन्म के बाद ही नसबंदी करा लेने के प्रति जागरूक किया जाता है। इसके प्रति भी जागरूकता बढ़ने लगी है। अब बेटियों के प्रति प्रेम कहें या परिवार नियोजन के नियमों का पालन। आम तौर पर ऐसे लोग भी होते थे जो दो बेटी अगर पैदा हो गई तो तीसरे में बेटे की चाहत रखते हैं, लेकिन अब इस तरह की मानसिकता भी बदल रही है। बहुत से ऐसे माता-पिता भी हैं, जो दो बेटियों के जन्म के बाद ही नसबंदी करा ले रहे हैं। बदलती सोच का इससे बेहतर परिणाम और नहीं हो सकता है। - डॉ. लिली श्रीवास्तव, एसआईसी, महिला अस्पताल