= श्रद्धा और भक्तिभाव से सोमवार को श्ाहर से लेकर गांव तक नाग देवता की पूजा हुई। शिवालयों में श्रद्धालुओं ने भगवान शिव के साथ नागदेव का पूजन-अर्चन किया। कालसर्प दोष से मुक्ति के लिए जैतपुरा स्थित नागकूप पर भीड़ उमड़ी रही।
नागपंचमी और सावन का सोमवार होने की वजह से श्रद्धालुओं ने भगवान शिव की विशेष कृपा के लिए पूजन-अर्चन किया। घरों की दीवारों, दरवाजों पर नाग देवता की तस्वीर लगाकर पूजन किया गया। वहीं, जैतपुरा के पास नागकुआं पर भगवान नागेश्वर के दर्शन के लिए सुबह से दोपहर तक लंबी कतार लगी रही। महिलाओं की खासी भीड़ थी। दूध, लावा, मदर व तुलसी की माला अर्पित कर पूजा की गई।
मंदिर के पुजारी कुंदन पांडेय ने बताया कि श्रद्धालुओं ने नागकुआं में जलाभिषेक कर सुख-समृद्धि के साथ कालसर्प दोष से मुक्ति की कामना की। वहीं, सपेरों ने गली-मुहल्लों में नागदेवता का दर्शन कराया। नागपंचमी पर काशी में महुवर की भी परंपरा है। नई सड़क स्थित सनातन धर्म इंटर कॉलेज में महुअर का खेल हुआ। महुअर देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ी थी। उधर तुलसीनगर कॉलोनी स्थित मंसा देवी मंदिर में भी दर्शन-पूजन हुआ। नमामि नंगे ने नागकूप पर सफाई अभियान चलाया।
नागकूप पर महर्षि पतंजलि ने की थी भाष्य की रचना
कारकोटक वापीतीर्थ के नाम से प्रचलित जैतपुरा के नागकूप पर ही महर्षि पतंजलि ने व्याकरणाचार्य महर्षि पाणिनि के भाष्य की रचना की थी। अन्नपूर्णा मठ मंदिर के महंत शंकरपुरी महाराज ने बताया कि विश्व में केवल तीन स्थान पर ही कालसर्प दोष की पूजा होती है। इसमें यह नागकूप कुंड श्रेष्ठ है। माना जाता है कि इस कुएं के अंदर सात कुएं हैं जो एक-दूसरे से जुड़े हैं। जहां से नागलोक जाने का रास्ता है। नागपंचमी शृंगारकर पूजन होता है। श्रावण पंचमी पर ही महर्षि पतंजलि की जयंती मनाई जाती है।
काशी की शास्त्रार्थ परंपरा को आगे बढ़ाने की जरूरत
वाराणसी। उत्तर प्रदेश नागकूप शास्त्रार्थ समिति की ओर से नागकूप पर महर्षि पतंजलि की जयंती भी मनाई गई। मुख्य अतिथि अन्नपूर्णा मंदिर के महंत शंकरपुरी ने कहा कि काशी की शास्त्रार्थ की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। इसे और आगे बढ़ाने की जरूरत है।
विशिष्ट अतिथि डॉ. नीलकंठ तिवारी ने कहा कि नागकूप पर शास्त्रार्थ देश के लिए काफी लाभकारी होगा। इससे व्याकरण, वेदांत, न्याय, मीमांसा दर्शन जैसे ग्रंथों पर विद्वानों का अध्ययन सुरक्षित है। इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए हर माह दो बार अमावस्या और पूर्णिमा पर मठों-मंदिरों में शास्त्रार्थ कराया जाए। इसमें उन्होंने सहयोग करने का आश्वासन दिया। शास्त्रार्थ में विद्वानों ने मीमांसा शास्त्र में विधि पक्ष को स्थापित करने के साथ न्याय दर्शन में ईश्वर की सिद्धि और हेत्वाभाष के सिद्धांतों पर विमर्श किया। जबकि साहित्य शास्त्र में काव्य लक्ष्य पर चर्चा हुई। इस दौरान 180 शोध छात्रों को प्रमाणपत्र और 21 विद्वानों को विशिष्ट शास्त्रार्थ प्रदर्शन के लिए सम्मानित किया गया। महंत बालक दास, प्रो. भगवतशरण शुक्ल, प्रो. रमाकांत पाण्डेय, प्रो. सदाशिव द्विवेदी, प्रो. जयप्रकाश नारायण त्रिपाठी, डाॅ. दिव्य चैतन्य ब्रह्मचारी, डाॅ. रामाश्रय शुक्ल, डाॅ. कमलेश झा, पं. सतीशचंद्र मिश्र ने भी विचार रखे। अध्यक्षता अखिल भारतीय संत समिति के महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने की। संचालन प्रो. रामनारायण द्विवेदी ने किया। शास्त्रार्थ के दूसरे दिन मंगलवार को बीएचयू के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में संगोष्ठी होगी। चार विद्वानों का सम्मान होगा। इसमें आयुर्वेद के व्याकरण महाभाष्य और योगासन तथा योग शास्त्र पर चर्चा होगी। संवाद