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नगरवधुओं ने निभाई परंपरा: महाश्मशान में नृत्य की थाप पर घुंघरुओं ने लगाई मुक्ति की गुहार, महोत्सव का समापन

Sat, 05 Apr 2025 05:41 AM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

जलती चिताओं के बीच नगरवधुओं ने बाबा मसाननाथ को नृत्यांजलि अर्पित की। यह नृत्य और संगीत महज प्रदर्शन नहीं, बल्कि उनकी आत्मा की पुकार थी एक बेहतर अगले जन्म की।
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महाश्मशान महोत्सव में नृत्य प्रस्तुत करतीं नगरवधु। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मणिकर्णिका महातीर्थ पर नृत्य की थाप पर घुंघरुओं ने मुक्ति की गुहार लगाई। धधकती चिताओं के बीच देर रात सात सुरों की सरगम झंकृत हुई। चैत्र नवरात्र की सप्तमी पर तीन दिवसीय महाश्मशान महोत्सव की अंतिम निशा नगर वधुओं के नाम रही।

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शुक्रवार की रात सन्नाटे में जब शवयात्रियों की भीड़ चिताओं की लपटों को निहार रही थी, नगरवधुओं ने अपने नृत्य से एक अनोखा कौतुहल जगा दिया। बाबा मसाननाथ का प्रांगण रजनीगंधा, गुलाब और अन्य सुगंधित फूलों से सजाया गया था।
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एक ओर चिताओं की आग की तपिश थी, तो दूसरी ओर डोमराज की मढ़ी के नीचे नगरवधुओं के घुंघरुओं की मधुर झंकार गूंज रही थी। यह दृश्य मृत्यु और जीवन, शोक और संगीत, भक्ति और मुक्ति की चाह के विरोधाभासों का अनोखा संगम था। इसके पूर्व बाबा को तंत्रोक्त विधान से पंचमकार का भोग लगाया गया और भव्य आरती की गई। 

नगरवधुओं ने बाबा को रिझाने के लिए भजन गाए। दुर्गा दुर्गति नाशिनी..., डिमिग डिमिग डमरू कर बाजे..., डिम डिम तन धिन-धिन... जैसे स्वरों से माहौल गूंज उठा। ओम नमः शिवाय और मणिकर्णिका स्तोत्र के बाद खेले मसाने में होरी... जैसी रचनाएं भी गूंजीं। ठुमरी और चैती के सुरों के साथ उन्होंने बाबा के चरणों में अपनी गीतांजलि अर्पित की।

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नगर वधुओं ने किए नृत्य। - फोटो : अमर उजाला
राजा मानसिंह ने शुरू कराया था यह उत्सव
महाश्मशान सेवा समिति के अध्यक्ष चंद्रिका प्रसाद गुप्ता उर्फ चैनु साव ने बताया कि मान्यता है कि अकबर के नवरत्नों में से एक राजा मानसिंह ने काशी में बाबा मसाननाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। उस दौर में राजा एक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करना चाहते थे, लेकिन कोई भी कलाकार श्मशान में प्रदर्शन के लिए तैयार नहीं था। 

तब काशी की नगरवधुओं ने यह जिम्मा उठाया और अपनी कला से बाबा के दरबार को सजाया। यहीं से यह परंपरा शुरू हुई, जो आज तक कायम है। हर साल चैत्र नवरात्र की सातवीं रात को यह उत्सव काशी की श्मशान भूमि पर जीवंत हो उठता है।

नगरवधू शीला ने कहा कि हम हर साल बाबा के दरबार में नृत्य करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि अगले जन्म में हमें इस जीवन से मुक्ति मिले। उनके घुंघरुओं की हर झंकार एक दुआ है, हर थाप एक उम्मीद। यह महाश्मशान महोत्सव सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि काशी की उस अनोखी संस्कृति का प्रतीक है, जहां मृत्यु के बीच जीवन नृत्य करता है और मुक्ति की चाह कभी सोती नहीं।
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