132 साल पहले क्वींस इंटर कॉलेज के तीन छात्रों बाबू श्याम सुंदरदास, रामनारायण मिश्र और ठाकुर शिवकुमार सिंह ने नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना की थी। अंग्रेजी, उर्दू और फारसी से आक्रांत वातावरण में 16 जुलाई 1893 को हिंदी का जो बीज रोपा गया, वह आज वटवृक्ष का रूप ले चुका है। बुधवार को हिंदी भाषा-साहित्य और नागरी लिपि के सतत उत्थान पर एकाग्र देश की सबसे पुरानी ये संस्था नागरी प्रचारिणी सभा ने अपना जन्मदिन मनाया।
इसी सभा ने हिंदी की पहली शोध पत्रिका का प्रकाशन किया। आज भी ये शोध पत्रिकाओं में सर्वश्रेष्ठ है। सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने बताया कि संघर्ष में सभा को अपने युग के सभी विद्वानों एवं हिंदी-प्रेमियों का पूरा सहयोग मिला। पिछले 84 वर्षों में सभा ने अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए हैं।
सभा के प्रयत्न से 1900 में उत्तर प्रदेश (तत्कालीन संयुक्त प्रांत) में अदालतों और सरकारी कामकाज में नागरी लिपि के प्रयोग की आज्ञा प्रसारित की गई। शासकीय कर्मचारियों के लिए हिंदी और उर्दू दोनों का ही ज्ञान आवश्यक कर दिया गया। इसका नेतृत्व महामना पंडित मदनमोहन मालवीय ने किया।
सभा के परिसर में आर्यभाषा पुस्तकालय की स्थापना सन् 1896 ई. में ठाकुर गदाधर सिंह के सहयोग से हुई। उन्होंने अपना निजी पुस्तकालय सभा को प्रदान कर दिया। अब यह पुस्तकालय देश में हिंदी की पुरानी पुस्तकों का सबसे बड़ा पुस्तकालय है।
सरस्वती के प्रकाशन एवं संपादन की व्यवस्था की शुरू
व्योमेश शुक्ल ने बताया कि हिंदी की सर्वाधिक महत्वपूर्ण पत्रिका सरस्वती के प्रकाशन एवं संपादन की व्यवस्था सभा ने ही की थी। त्रैमासिक नागरी प्रचारिणी पत्रिका हिंदी की पहली शोध पत्रिका है और आज भी शोध पत्रिकाओं में सर्वश्रेष्ठ है।