Mukhtar Ansari Death: दिल्ली में जावेद के नाम से अपराध करता था, माफिया मुख्तार की खास कहानियां
Sat, 30 Mar 2024 01:52 PM IST
शाहरुख खान
पुष्पेन्द्र कुमार त्रिपाठी, अमर उजाला, वाराणसी
सार
पूर्व डीजीपी बृजलाल ने माफिया मुख्तार की खास कहानियां बताई हैं। पूरब का डॉन दिल्ली में जावेद के नाम से अपराध करता था। रमापति सिंह की हत्या के बाद से पूर्वांचल में गैंगवार की शुरुआत हुई और नौ हत्याएं हुई।
मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, अशरफ, शहाबुद्दीन और विजय मिश्रा जैसे अपराधी भ्रष्ट राजनीति और राजनेताओं की देन हैं। ये बातें उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक बृजलाल ने कहीं। उन्होंने कहा कि प्रदेश में कल्याण सिंह की सरकार बनी तो मुख्तार अंसारी मुंबई होते हुए दिल्ली और फिर चौटाला गांव गया।
विज्ञापन
दिल्ली में मुख्तार को जावेद भाई कहा जाता था और उसके लिए शूटरों की खेप खड़ा करने वाला मुन्ना बजरंगी महफूज भाई के नाम से जाना जाता था। दिल्ली और उसके आसपास के राज्यों में मुख्तार ने जसविंदर राकी, राजवीर रमाला, मुन्ना बजरंगी, अताउर्रहमान और अफरोज जैसे बदमाशों की मदद से अपहरण और रंगदारी जैसी वारदातों से जमकर पैसा कमाया।
पूर्व डीजीपी ने कहा कि सैम ग्रुप यानी शहाबुद्दीन, अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी की आपस में बहुत करीबी थी। तीनों अपराधी आपस में हथियारों की अदला-बदली से लेकर एक-दूसरे को अपने शूटर भी देते थे।
विज्ञापन
डेढ़ बिस्वा जमीन का विवाद पूर्वांचल में गैंगवार का आधार बना
गाजीपुर के मुड़ियार गांव में रमापति सिंह रहते थे। उनके भतीजे साधु सिंह और मकनू सिंह से डेढ़ बिस्वा जमीन को लेकर विवाद था। 24 जून 1984 को छह बेटों के पिता रमपति सिंह अपना खेत जोत रहे थे। उसी दौरान मां के उकसाने पर साधु सिंह ने अपनी 30 कैलिबर की लुगर पिस्टल से रमापति सिंह की हत्या कर दी गई।
यहीं से पूर्वांचल में गैंगवार की शुरुआत हुई और नौ हत्याएं हुई। रमा पति सिंह की हत्या के बदले में 10 अक्तूबर 1985 को उनके बेटों ने मकनू सिंह की हत्या की। इसके बाद साधु सिंह ने 2 जनवरी 1986 को रमापति सिंह के दो बेटों की हत्या की। यह ऐसा पहला मर्डर था, जिसमें मुख्तार अंसारी भी शामिल था लेकिन उसका नाम कहीं नहीं आया।
पूर्व डीजीपी ने कहा कि मुख्तार अंसारी का परिवार सामान्य किस्म का था। बड़ा भाई अफजाल टॉकीज संचालन करते थे। मुख्तार छोटे-मोटे साइकिल ठेके वगैरह देखता था। उसके इलाके में तेजी से उभरता हुआ एक नाम सच्चिदानंद राय का था। मुख्तार के पिता से सच्चिदानंद की कुछ कहासुनी हुई तो उसने उसे प्रतिष्ठा का विषय बना लिया। चूंकि उस क्षेत्र में भूमिहार ज्यादा थे तो मुख्तार ने साधु सिंह से मदद मांगी।
17 जुलाई 1986 को सच्चिदानंद राय की हत्या कर दी गई और यहीं से मुख्तार का नाम जरायम जगत में सुर्खियों में आया। साधु सिंह की हत्या के बाद 20 नवंबर 1989 को मुख्तार ने उसके गैंग की कमान संभाली।
मई 1990 में बनारस कचहरी में रमापति सिंह के छोटे बेटे त्रिभुवन सिंह के सिर पर हाथ रखने वाले साहिब सिंह की हत्या मुख्तार ने कराई। इसके बाद गाजीपुर के मेदिनीपुर निवासी रणजीत सिंह की हत्या 23 जनवरी 1991 को मुख्तार ने अपने खास गुर्गे अताउर्रहमान उर्फ बाबू से एक गोली मरवा कर कराई। फिर, 3 अगस्त 1991 को वाराणसी के चेतगंज में अवधेश राय की हत्या की गई।
विदेशों में छुपे हैं मुख्तार अंसारी के गुर्गे
मुख्तार अंसारी का गुर्गा अताउर्रहमान उर्फ बाबू और शहाबुद्दीन ऐसे बदमाश हैं, जिनके बारे में वर्ष 1999 से सीबीआई भी पता नहीं लगा पाई ई है। है। पूर्व डीजीपी वृज लाल ने कहा कि अताउर्रहमान पाकिस्तान में शरण लिया हुआ है। विश्वास नेपाली देश छोड़कर कक्का भागा हुआ है। बताया जाता है कि वह नेपाल में शरण लिया हुआ है। शहाबुद्दीन भी देश से बाहर ही छिपा है।