बताया जाता है कि उस वक्त उस नाल से तीन नाल तैयार की गई थी। उसे शिवाला के ही एक इमामबाड़े में रखा गया था। उस वक्त के लोग कहते थे कि आशूरा यानी मुहर्रम के दिन जो असली नाल थी वो बेहद सुर्ख हो जाया करती थी और उसमें से 'या हुसैन या हुसैन' की आवाज आती थी। कुछ ही दिन में इस नाल की मान्यता पूरे देश में फैल गई। चूंकि इसे हजरत कासिम के ही घोड़े की नाल माना गया इसलिए उसके बाद शिवाला से कासिम की याद में दूल्हे का जुलूस निकाला जाने लगा। शिवाला स्थित दूल्हे के इमामबाड़े में आज भी वो तीनों नाल रखे हुए हैं।
हजरत अली समिति के सचिव सैयद फरमान हैदर बताते हैं कि आज से करीब 1300 साल पहले जब जुल्म के खिलाफ और इंसानियत को बचाने के लिए करबला की जंग इमाम हुसैन ने जंग लड़ी उसमें हजरत कासिम भी शामिल हुए थे। उस वक्त उनकी उम्र यही करीब 17 साल ही होगी और उनकी शादी इमाम हुसैन की बेटी से होने वाली थी। लेकिन जब करबला की जंग छिड़ी तो उसमें वो शहीद हो गए। उन्हीं की याद में नौवीं मुहर्रम को दूल्हे का जुलूस निकाला जाता है। हर साल शिवाला इलाके के ही एक नौजवान को दूल्हा बनाया जाता है। नाल कमेटी जिन्हें दूल्हा बनाती है, नौवीं मुहर्रम को गंगा में उसे नहलाया जाता है। उसे पाक साफ कर दूल्हे के इमामबाड़े पर ले जाया जाता है।
दूल्हे के इस जुलूस में शिया और सुन्नी की एकता की भी मिसाल देखने को मिलती है। यूं तो दूल्हे का इमामबाड़ा सुन्नी जमात का है लेकिन नौवीं मुहर्रम को शिया समुदाय के लोग ही इमामबाड़े पर जाकर नौहे पढते हैं। उसके बाद फातिहा पढ़ी जाती है। फातिहा पढ़ने के दौरान ही जिसे दूल्हा बनाया जाता है वो वहां रखी तीन नाल में से दो नाल को पकड लेता है और फिर ना तो वो नाल छोड़ता है और ना ही उसे कोई होश रहता है। इमामबाड़े के इर्द गिर्द चक्कर लगाने के बाद ये जुलूस अपने निर्धारित रास्तों से होकर गुजरता है। ये जुलूस 72 जगहों से गुजरता है जहां अंगारे बिछे होते है।
अंगारों से निकलते शोले के बीच से दूल्हे का जुलूस निकलता है और हजरत कासिम की शहादत को याद किया जाता है। इतनी जगह से अंगारों से गुजरने के बाद भी किसी को कुछ नहीं होता, यह करिश्मा ही कहा जाएगा। ये जुलूस शहर के तकरीबन हर वक्फ इमामबाड़े से होकर गुजरता है और ताजियों को सलामी देता है। एक तरह से देखा जाए तो ये पूरा कहानी या मान्यताअध्यात्म और मुसलमानों की अकीदत से जुड़ा है।
सिर्फ दूल्हे का ही जुलूस नहीं बनारस में मुहर्रम के दौरान ऐसे कई जुलूस निकलते हैं जो ना सिर्फ ऐतिहासिक हैं बल्कि पूरी दुनिया में इकलौते भी। दूल्हे की जुलूस की तरह ही छह मुहर्रम को बनारस के कच्चीसराय से निकलने वाला 40 घंटे का जुलूस भी अपने आप में खास है। ये इकलौता जुलूस है जो कि लगातार 40 घंटे से भी अधिक समय तक चलता है। अलम, दुलदुल के साथ ही इस जुलूस में बाजे गाजे के साथ ही हाथी, ऊंट भी शामिल होता है। इसे गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में शामिल कराने की भी कोशिश की जा रही है।
इसी तरह खुशी के साज शहनाई पर भी यहां मातम की धुनें मुहर्रम के दौरान ही सुनने को मिलती हैं जिसकी रवायत खुद भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां ने शुरू की थी। पांचवीं मुहर्रम को दालमंडी से उठने वाले मुहर्रम के जुलूस में उस्ताद बिस्मिल्लाह खां शहनाई पर मातमी धुन बजाकर इमाम हुसैन और करबला के शहीदों को खिराजे अकीदत पेश किया करते थे। आज भी उनकी ये रवायत कायम है। अब उनके घरवाले इस परंपरा को निभा रहे हैं।