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मतिया मरलस कवन सवतिया कहवां बितवला रतिया ना...

Thu, 11 Aug 2016 02:17 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
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सावन के सुर बहुत ही मधुर और लुभावने हैं। इसमें जीवन का जो रिद्म है, वह किसी दूसरे महीने में मयस्सर नहीं होता। पति के वियोग में जिस विरहिनी का तन-मन सुलग रहा हो वह चाह कर भी पाती नहीं लिख पाती। उसके विरह की पीड़ा जब शब्दों की सामर्थ्य से परे हो जाती है, तब कंठ से कजरी फूटती है। विरह की पाती के लिए उपयुक्त स्याही नहीं मिलती तब विरहिनी अपनी ननद से आंचल को ही कागज समझ कर आंसुओं से पाती लिखकर उसे बादलों के माध्यम से भिजवाने की मार्मिक अरज लगाती है। प्रेम की यह गहराई सिर्फ कजरी लोक गीत में ही पाई जाती है। मिर्जापुर से बनारस तक की कजरी के भावों और इसके चलने के बारे में इस अंक में जानिए यश भारती पुरस्कार प्राप्त लोक गीत गायक विष्णु यादव से।
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कजरी और मेघ दोनों के वर्ण में समानता पाई जाती है। कजरी कहीं प्यार है तो कहीं मनुहार। अपनेपन की जिद भी इसमें मिलती है। यह कहना है प्रसिद्ध लोक गीत गायक विष्णु यादव का। सावन में पुरवाई जब सनन-सनन चलती है तब विरहिनी का कलेजा इसलिए थरथराने लगता है क्योंकि उसे डर लगने लगता है कि कहीं यह सौतन पुरवाई मेघों को उड़ाकर कहीं और न ले जाए। ऐसा हुआ तो प्रियतम तक मेरा संदेश पहुंच ही नहीं सकेगा। एक ओर पुरवाई से समृद्ध होकर धन-धान्य के लिए वर्षा करने वाले आर्द्रा नक्षत्र के मेघ हैं तो दूसरी ओर ठहरे, कलपते हुए मन को आनंद, शीतलता देने वाले बालम के प्रतीक मेघ। दोनों का मिलन तड़पते मन को तृप्त, संतृप्त बनाता है। कजरी मिर्जापुर और बनारस की लोक संस्कृति में स्थान ऊंचे मानकों पर स्थापित है। सावन के झूले, मेहंदी, कजरी, रतजगा, दंगल यादगार बन जाते हैं। आधुनिकता की होड़ में भी अभी कजरी पूर्वांचल में हर आमोखास की जुबान पर है।


वह बताते हैं कि पहले कभी महिलाओं का कजरी दंगल होता था। तब महिलाएं सिर पर पगड़ी बांधकर और हाथ में लाठी लेकर रात भर दंगल करती थीं। वह कजरी में प्रेम आध्यात्म का वर्णन इस तरह करते हैं- हरे राम झूला झूलें बनवारी कदम के डारी रे हरी/ कोयल कुंहके ले अमवा के डारी बरसे बदरी भींजे चोलिया ओसारी रामा...। बताते हैं कि भोगाबीर, सुंदरपुर, खोजवा, छोटी गैबी में कजरी के मशहूर मुकाबले होते थे। वह कजरी गुनगुनाते हैं- भावे ना पपिहा के बोलिया अरे सांवरिया...मतिया मरलस कवन सवतिया कहां बितउला रतिया ना...। कजरी में विरह के भावों को वह व्यक्त करते हैं- हमें श्याम बिना कुछ ना सोहाला सखी जिया घबराला सखी ना...। चौक, ठठेरी बाजार की गलियों से जुड़ी बनारस की मशहूर कजरी का जिक्र करना वह नहीं भूलते- गोरिया तोरे गाल पर मासा एक दिन चली  गड़ासा ना...। कहते हैं, कजरी लोक जीवन का अनूठा रंग है।
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