परंपराओं के शहर बाबा विश्वनाथ की नगरी में मंगलवार को भगवान परशुराम भवपूर्ण रूप से मनाई गई। अष्ट धातु निर्मित प्राचीन परशुराम मूर्ति के साथ महंत के आवास से गर्भ गृह पहुंचे भक्तों ने पूजन अर्चन किया गया। देवाधिदेव महादेव की कृपा से भगवान परशुराम ने शस्त्र और शास्त्र की विद्या प्राप्त की थी।
परशुराम पूजन की यह परंपरा काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत डॉ. कुलपति तिवारी के यद्महां काफी समय से पारंपरिक रूप से हो रही थी। कोरोना के कारण यह परंपरा बाधित हुई थी। भक्तों के हुजूम के साथ परशुराम जी की प्रतिमा बाबा के गर्भगृह में पूजन के साथ परंपरा का निर्वहन महंत ने किया। बताया कि भगवान परशुराम चारों युगों यानि सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग में लोक में विचरण कर रहे हैं। त्रेता युग में भगवान श्रीराम को धनुष भगवान परशुराम ने ही दिया था, जिससे भगवान राम ने राक्षसों का वध किया था। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र भी भगवान परशुराम ने ही दिया था। उनकी व्यापकता संसार के हर कोने में रही और युग में रही। वे अक्षय हैं, अनंत और प्रलय के बाद भी रहने वाले देवता है। गणपति से युद्ध में उन्होंने अपने अस्त्र का प्रयोग करके उनका एक दांत खंडित कर दिया था जिसके बाद भगवान गणेश का नाम एकदंत पड़ा। भगवान शिव ने उन्हें मृत्युलोक के कल्याणा के परशु प्रदान किया जिससे वे परशुराम कहलाए। ऐसी मान्यता है कि भगवान परशुराम वर्तमान समय में तपस्या में लीन हैं। समय पर वे अपने भक्तों को दर्शन देते रहते है।
इस अवसर पर हिमांशु राज, अजय शर्मा, ऋ षि झिंगरन, महेश उपाध्याय, उमाशंकर,मुन्ना पाठक, दिनेश शंकर, यश शर्मा आदि मौजूद रहे।