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पुण्यतिथि विशेष: मिर्जा गालिब ने ही काशी को कहा था काबा-ए-हिंदुस्तान

Thu, 15 Feb 2018 02:24 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
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मिर्जा गालिब - फोटो : self
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तआ’ल अल्लाह बनारस चश्म-ए-बद-दूर। बहिश्त-ए-खुरर्म-ओ-फिरदौस-ए-मा’मूर। हे प्रभु बनारस को बुरी नजर से दूर रखना, क्योंकि यह आनंददायिनी और फिरदौस-ए-मा-मूर (सात स्वर्गों में से एक का नाम, भरा पूरा स्वर्ग) है। जाने-माने शायर मिर्जा गालिब ये बातें अपने एक महीने के बनारस प्रवास के अनुभवों के आधार पर लिखी थी। 
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उनका मानना था कि यहां की आबोहवा में उस शक्ति का अनुभव होता है, जो न केवल हर तकलीफ दूर कर देती है बल्कि इसमें वह ताकत है, जो मृत लोगों को भी जीवित कर देती हैं। इसीलिए उन्होंने काशी को काबा-ए-हिंदुस्तान कहा था। अब गालिब की शायरी और गजलों की जानकारी ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए बीएचयू परिसर में इनके नाम पर चेयर (शोध पीठ) स्थापित कराने की तैयारी है। उर्दू विभाग ने इसकी पहल शुरू कर दी है।

गालिब का बनारस से एक खास लगाव था। नवंबर, 1827 में कानपुर, लखनऊ, इलाहाबाद होते हुए गालिब बनारस पहुंचे। उनकी तबीयत ठीक नहीं थी, वह केवल दो-तीन दिन रहना चाह रहे थे, लेकिन बनारस की कला, संस्कृति, आध्यात्मिकता से वह इतने प्रभावित हुए कि एक महीने तक रुक गए। इसका चित्रण उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति चराग-ए-दैर (मंदिर का दीया) में किया गया है।
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उर्दू विभाग के अध्यक्ष डॉ. आफताब अहमद आफाकी ने बताया कि पूर्व कुलपति प्रो. पंजाब सिंह ने मार्च, 2008 में गालिब इंस्टीट्यूट दिल्ली की ओर से आयोजित कार्यक्रम में चेयर स्थापित करने की घोषणा की थी। इसके लिए अब मंत्रालय को पत्र लिखने की तैयारी है।

 उर्दू विभाग में गालिब की पुण्यतिथि (15 फरवरी) पर गोष्ठी, गजल और क्विज का आयोजन किया गया है। कला संकाय सभागार में आयोजन के पहले चरण में संगोष्ठी, दूसरे सत्र में दोपहर दो बजे से गालिब क्विज और गजल गायन का आयोजन होगा। 
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ये हैं मिर्जा गालिब के सबसे मशहूर शेर..

मिर्जा गालिब
शेरों-शायरी की दुनिया में मिर्जा गालिब एक पैमाना है जिसके आगे लगभग सारे शायर नतमस्तक हैं। गालिब ने शायरी की दुनिया को मोहब्बत और गम से ऐसा लबरेज किया है कि उलफत का गुलशन आज भी गालिब की शायरियों से महक रहा है। गालिब की परिपाटी में चलकर ही कई शायरों ने अपने को मुकम्मल किया है। आज भी गालिब के चाहने वालों की कमी नहीं है। इतने सालों बाद उतनी ही शिद्दत से गालिब को हर जगह तारीफ मिल रही है। गालिब की आज पुण्यतिथि है। इस अवसर पर हम यहां काव्य चर्चा के तहत  उनके स्पेशल शेर पेश कर रहे हैं। 

अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता...
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता

दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ

दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना...
इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
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