31 अक्टूबर 1984 को बनारस में हुई आगजनी की कालिख अभी तक दीवारों से नहीं मिटी है। पुलिस किसी गुनहगार को 34 साल एक माह और 16 दिन बाद भी चिह्नित नहीं कर सकी। कोर्ट द्वारा सिख दंगे में आरोपी कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को दोषी ठहराया तो वाराणसी में दर्द भरी दास्तां याद कर आगजनी में मारे गए काशीनाथ गुजराल के बेटे सत्येंद्र की आंखें भर आईं।
कोर्ट का फैसला आने के बाद सत्येंद्र ने बताया कि आजादी के बाद 1950 में पंजाब से आकर काशीनाथ गुजराल अपने छोटे भाई जोगेंद्र के साथ लंका में सरदार स्टोर्स के नाम से मेडिकल स्टोर और उनके भाई सरदार प्रॉविजन स्टोर्स नाम से दुकान चलाने लगे। दुकान के पीछे बने मकान में ही परिवार रहता था। काशीनाथ गुजराल बैंक में नौकरी करते थे। 31 अक्टूबर 1984 को दंगाइयों ने दुकान-मकान को आग लगा दी।