वाराणसी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से कम समय में दवाओं की खोज की जा सकती है। वर्तमान ड्रग डिस्कवरी एंड डेवलपमेंट पद्धति से दवाओं की खोज में 10 से 15 साल लगते हैं। वहीं, एआई आधारित तकनीक से 5 से 7 साल में ही दवाओं की खोज हो सकती है। ये बातें शुक्रवार को आईआईटी बीएचयू में कार्यशाला में सहायक प्रोफेसर रजनीश ने कहीं। आई-डीएपीटी हब फाउंडेशन की कार्यशाला में देशभर से जुटे 75 युवा वैज्ञानिकों को दवाओं की खोज में एआई के उपयोग के बारे में जानकारी दी गई।
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प्रो. रजनीश ने बताया कि नई दवा की खोज में बीमारी के संभावित लक्षणों की पहचान की जाती है। लक्ष्यों के आधार पर ड्रग टारगेट निर्धारित कर ड्रग मॉलिक्यूल्स की खोज की जाती है। जो बीमारी के लक्षणों के अनुसार परिणाम दे सके। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से मॉलिक्यूल्स की खोज के साथ ही प्री- क्लीनिकल अध्ययन और क्लीनिकल परीक्षण का समय भी कम किया जा सकता है। वहीं एआई के माध्यम से रोगों का भी जल्द पता लगाया जा सकता है। रोगों का पता चलने और नई दवाओं की खोज में समय कम लगने से समय पर उपचार शुरू हो सकेगा। कार्यशाला के अंतिम दिन आईआईटी बीएचयू के कंप्यूटर विज्ञान और इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर एसके सिंह ने डीप टेंपोरल कन्वोल्यूशनल नेटवर्क का उपयोग कर एंटी फंगल पेप्साइज की खोज के बारे में जानकारी दी। बीएचयू की डॉ. मंजरी गुप्ता ने बताया कि एआई के क्षेत्र में तकनीकी प्रगति से दवाओं की खोज में क्रांति आएगी।