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Mauni Amavasya 2026: मौनी अमावस्या पर नदी में नहाने का है खास महत्व, बीएचयू के ज्योतिषाचार्य की राय जान लें

Sun, 18 Jan 2026 07:28 AM IST
प्रगति चंद अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News: मौनी अमावस्या पर नदी में स्नान करने का खास महत्व है। ज्योतिषाचार्य के अनुसार व्रत, दान, तप से श्री हरि उतने खुश नहीं होते जितने कि मौनी अमावस्या के स्नान से। 
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श्रद्धालु - फोटो : पीटीआई
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विस्तार
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व्रत, दान और तपस्या से भी भगवान श्रीहरि को उतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी कि मौनी अमावस्या में स्नान मात्र से होती है। सभी पापों से मुक्ति और भगवान वासुदेव का प्रेम पाने के लिए हर व्यक्ति को इस दिन स्नान करना चाहिए। इस दिन की विशेषता यह है कि जहां कहीं भी जल हो, वह गंगाजल के समान ही होता है। फिर भी प्रयाग, काशी, नैमिषारण्य, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार तथा अन्य पवित्र तीर्थों और नदियों में स्नान का बड़ा महत्व है।

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बीएचयू के ज्योतिषाचार्य प्रो. विनय पांडेय ने बताया कि यह जानकारी शास्त्रसम्मत है। प्रो. विनय पांडेय के अनुसार, माघ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या मौनी अमावस्या शनिवार रात 11 बजकर 38 मिनट से प्रारंभ हो चुकी है और रविवार को रात 12 बजकर 57 मिनट तक रहेगी।

ब्राह्मणों के लिए जलाएं अग्नि

नित्यकर्म और स्नान के बाद आदि का दान अवश्य करें। साधु, महात्मा और ब्राह्मणों के लिए अग्नि प्रज्वलित कर उन्हें कंबल दें। गुड़ में काला तिल मिलाकर लड्डू बनाना चाहिए और उसे लाल वस्त्र में बांधकर दान दें। स्नान और दान के अलावा इस दिन पितृ-श्राद्ध आदि करने का भी विधान है। इस दिन तिल अवश्य खाना चाहिए, क्योंकि तिल सृष्टि का प्रथम अन्न है।

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स्नान पूर्व और स्नान के बाद न तापे आग
तिल के लड्डू, तिल का तेल, आंवला, वस्त्र, कंबल, लाल कपड़ा, ऊन, रजाई, स्वर्ण, जूता-चप्पल और सभी प्रकार के चादरें दान करें। दान देते समय माधवः प्रियताम् अवश्य कहें। स्नान पूर्व और स्नान के बाद आग नहीं तापना चाहिए।
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मौनी अमावस्या... मौन रहकर शरीर, आत्मा और मन का गंगा में होगा संगम, यही है मौनी अमावस्या

सभी सिद्धियों का मूल मौन ही है। मां गंगा हमारे शरीर, आत्मा और मन तीनों को मिलाने का माध्यम बनेंगी। यही मौनी अमावस्या का मूल है। दरअसल, मकर राशि जीव के शरीर का प्रतीक है, सूर्य आत्मा का और चंद्रमा मन का प्रतीक। इन तीनों का एक साथ योग ही मौनी अमावस्या है। यह अपने आत्म-साक्षात्कार का पर्व है। मानव शरीर में तीन तरह के मल हैं, जिन्हें साफ किया जाता है। कर्म, भाव और अज्ञान का मल। इनका नाश गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम में मौनी अमावस्या के दिन केवल स्नान मात्र से हो जाता है। लेकिन लोग अपनी प्रकृति से बंधे हैं और फिर उसी स्वभाव के अनुसार कर्म करते हैं। बीएचयू के ज्योतिष विभाग में शोध कर चुके डॉ. अधोक्षज पांडेय ने ये जानकारियां दी।

केवल शरीर को जल में डुबोना ही स्नान नहीं
डॉ. पांडेय ने कहा कि माघ मास की अमावस्या को मौनी अमावस्या इसलिए कहा गया है क्योंकि इस दिन मौन-स्नान को सिद्धिदायक माना गया है। केवल शरीर को जल में डुबोना ही स्नान नहीं है; वास्तविक स्नान तो वाक्-संयम है। मन से वाणी उत्पन्न होती है। मौन के माध्यम से प्राणशक्ति का संरक्षण होता है और अन्तःकरण शुद्ध होता है। अनियंत्रित वाणी अनावश्यक शब्दों के माध्यम से प्राणशक्ति का क्षय करती है। इसलिए शास्त्रों ने मौन को व्रत का स्वरूप दिया है। मौनी अमावस्या के दिन त्रिवेणी स्नान का फल सौ अश्वमेध यज्ञ और हजार राजसूय यज्ञ के समान होता है।
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