वाराणसी। भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी मथुरा की जरी पोशाक और स्वाधीनता संग्राम में अहम भूमिका निभाने वाले मेरठ के बिगुल को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग प्रदान किया गया है। मथुरा की जरी पोशाक सदियों से कृष्ण भक्ति, शृंगार परंपरा और अद्भुत कारीगरी का प्रतीक रही है। इस कला में काफी बड़ी संख्या में मुस्लिम शिल्पी भी जुड़े हैं, जिनकी कई पीढ़ियां मथुरा में इसी परंपरा को आगे बढ़ाती रही हैं। साथ ही हजारों महिला कारीगर भी जरी कढ़ाई में अपना योगदान दे रही हैं।
दूसरी ओर मेरठ का बिगुल न सिर्फ एक वाद्य यंत्र है, बल्कि भारत के स्वतंत्रता इतिहास का एक प्रमुख प्रतीक भी है। 1857 की क्रांति में बिगुल की गूंज ने स्वतंत्रता संग्राम की आग प्रज्ज्वलित की थी। आज भी सेना, पुलिस बल और स्कूलों में अनुशासन व शुरुआत के संकेत के रूप में बिगुल की धुन महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मेरठ अपने पारंपरिक संगीत वाद्य यंत्र निर्माण के लिए विश्वभर में जाना जाता है, जहां आज भी बिगुल, ट्रम्पिट, ड्रम सहित लगभग दस प्रमुख वाद्य यंत्र बड़ी मात्रा में बनाए जाते हैं।
जीआई विशेषज्ञ पद्मश्री डॉ. रजनीकांत ने बताया कि इस पंजीकरण में जिला प्रशासन, सिडबी और खजानी वेलफेयर सोसाइटी की अहम भूमिका रही, जिसने इस जरी पोशाक को कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से जीआई पंजीकरण दिलाने में सक्रिय मोर्चा संभाला। मेरठ के बिगुल को जीआई टैग दिलाने में नाबार्ड उत्तर प्रदेश, जिला प्रशासन और मेरठ वाद्य यंत्र निर्माता-विक्रेता वेलफेयर एसोसिएशन ने मिलकर आवेदन प्रस्तुत किया था। जीआई टैग मिलने से स्थानीय कारीगरों की आमदनी बढ़ेगी। साथ ही वैश्विक बाजार में इन पारंपरिक उत्पादों की पहचान और मांग भी बढ़ेगी।