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देश के लिए पति ने दिया प्राणों का बलिदान, अब अकेले बेटियों के साथ गुजर कर रही शहीद की पत्नी

Thu, 26 Jul 2018 12:39 PM IST
क्राइम डेस्क, अमर उजाला, मऊ
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यूपी में मऊ जिले के निवासी अंबरीश राय देश की रक्षा के लिए 6 जून 2016 में सियाचीन ग्लेशियर में दुश्मन देश के सैनिकों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए शहीद हो गए। उसके बाद से अंबरीश राय की विधवा ज्योत्सना अपनी दो बेटियों के साथ मायके कोलकाता में गुजर कर रही है। बड़ी बेटी आठ और छोटी बेटी छह साल की थी तभी अंबरीश दुश्मनों लड़ते हुए शहीद हुए।
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शहीद के पिता के नाम की अचल संपत्ति में अब केवल सहरोज में पुश्तैनी मकान ही बिकने से बचा है। शहीद के पिता अपनी विवाहिता बेटियों के पास ही रहते हैं। सारे खेत बिक चुके हैं। मकान मुकदमे के चलते बच गया है। विधवा अभी कभार अपने पति के चाचा बलिराम राय के घर पर किसी कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आती है।

शहीद के चाचा बलिराम राय की पीड़ा है कि सरकार ने शहीद के परिवार अथवा उसके नाम पर कुछ भी नहीं किया। इससे पूरे गांव वासियों में आक्रोश है। सहरोज गांव निवासी अंबरीश राय के पिता नारद राय बंगाल में बिरला ग्रुप में नौकरी करते थे।
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वहीं पर अंबरीश की शिक्षा दीक्षा हुई। वहीं से अबंरीश सेना में आर्टिलरी में भर्ती हो गया। वहीं पर उसकी शादी बिहार निवासी भोला तिवारी की बेँटी ज्योत्सना से हो गई। ज्योत्सना की बेटी आराधना दस साल और छोटी बेटी एसानी आठ साल की है।

गांव के लोग बताते हैं कि अंबरीश इकलौता बेटा था और उसकी दो बहनें हैं जो शादी शुदा हैं। अंबरीश की मां का भी देहांत हो चुका है। पिता बेटियों के साथ रहते हैं। शहीद के चाचा के अनुसार ज्योत्सना बताती हैं कि दोनों बेटियों के भविष्य के लिए वे चिंतित हैं। पति की पेंशन की मदद से वे बेटियों को पढ़ा रही हैं। 
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पैसों के अभाव में पढ़ाई छोड़ चुका है शहीद का बड़ा बेटा

शहीद सुदामा राजभर की विधवा आशा - फोटो : अमर उजाला
20 फरवरी 2001 को जम्मू कश्मीर में शहीद हो गए मऊ शहर से सटे ख्वाजाजहांपुर मुहल्ला निवासी सुदामा राजभर की विधवा आशा कहती हैं कि जिस देश के लिए उनके पति ने अपने प्राणों की आहुति दे दी।

पति की शहादत के बाद उसी सरकार ने मेरे परिवार के लिए कुछ नहीं किया। यहां तक कि मकान के पास पानी के निकास की व्यवस्था तक नहीं है। नाबदान का पानी बाल्टी से निकाल कर दूर फेंकना पड़ता है।

पैसों के अभाव में बड़ा बेटा पवन 12 वीं के बाद पढाई छोड़ चुका है। पेंशन के रुपयों शहीद की विधवा अपने दो बेटों पंकज (18) और राहुल (12) को महाराष्ट्र के अहमदनगर में पढ़ा रही हैं। वहां पर इनका भतीजा इन बच्चों की देखभाल करता है।

शहीद की विधवा बताती हैं कि सरकार ने उनके परिवार की कोई सहायता नहीं की। हां, सदर विधायक मुख्तार अंसारी ने शहीद की याद में द्वार बनवाया है। इसके अलावा उन्हें कोई मदद नहीं मिली और न ही शहीद पति के नाम पर कुछ यादगार किया गया।
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