ाचीन पांडुलिपियों में छिपे आयुर्वेदिक औषधियों के अमूल्य ज्ञान को बीएचयू वैश्विक पहचान दिलाएगा। इसके लिए काशी हिंदू विश्वविद्यालय के आयुर्वेद संकाय के प्रो केआरसी रेड्डी काम कर रहे हैं। वह 15वीं शताब्दी से 20वीं शताब्दी के बीच आयुर्वेद औषधियाें से संबंधित ताड़पत्र और भोजपत्र पर लिखीं कईं पांडुलिपियां जुटा चुके हैं। प्रो. रेड्डी ट्रेडिशनल नालेज ऑफ डिजिटल लाइब्रेरी (टीकेडीएली) के टास्क फोर्स के इकलौते सदस्य हैं जो आयुर्वेद को सहेजने में जुटे हुए हैं।
देश के विभिन्न ग्रंथालयों में मौजूद तेलुगू, तमिल और संस्कृत में लिखीं इन पांडुलिपियों को दुनिया की विभिन्न भाषाओं में अनुवाद कर टीकेडीएल में उनका डिजिटलाइजेशन कराने की तैयारी है। इसके लिए केंद्र सरकार और टीकेडीएल ने सहमति भी दे दी है। इसके काम के लिए प्रो. रेड्डी ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर वित्तीय सहायता मांगी है। धनराशि मिलते ही इस दिशा में काम शुरू हो जाएगा। इसके पहले प्रो. रेड्डी आंध प्रदेश के बल्लभाचार्य की 15वीं शताब्दी में तेलगू भाषा में लिखी पांडुलिपी वैद्य चिंतामणि का संस्कृत व अंग्रेजी में अनुवाद और उसका प्रकाशन करा चुके हैं।
कौंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) के तहत केंद्र सरकार ने वर्ष 2001 में ट्रेडिशनल नालेज ऑफ डिजिटल लाइब्रेरी (टीकेडीएल) की स्थापना की थी। इसका काम देश के दुर्लभ ग्रंथों, पांडुलिपियों और आयुर्वेद से जुड़ी किताबों का अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद और डिजिटलाइजेशन करना है, भारतीय संस्कृति, ग्रंथों, पौराणिकता और आयुर्वेद को दुनिया जान सके। सबसे महत्वपूर्ण यह कि भारतीय प्राचीन ग्रंथों में वर्णित औषधियों या अन्य तथ्यों को कोई दूसरा देश अथवा देश के अंदर कोई व्यक्ति भाषा और शब्दों का हेरफेर कर अपने नाम से पेटेंट न करा सके।