केस एक: अव्यवस्था देख रिश्तेदार के गांव में कर दिया पिता का अंतिम संस्कार
चेतगंज के रहने वाले रमेश के पिता की मृत्यु हुई, लेकिन श्मशान घाट पर लंबी कतार, अव्यवस्था और संक्रमण को देखते हुए उन्होंने अहरौरा में अपने रिश्तेदार के गांव के पास अंतिम संस्कार की क्रिया को पूर्ण किया। उन्होंने बताया कि मन दुखी तो था, लेकिन उनके पास कोई और विकल्प नहीं था।
केस दो : दूसरे को पैसे देकर किया मां का अंत्येष्टि का आग्रह और चले गए
कैमूर के रहने वाले राजेश की मां का निधन बीएचयू में हो गया। शव लेकर हरिश्चंद्र घाट पहुंचे। दस घंटे बीत जाने के बाद भी अंतिम संस्कार नहीं हो सका। अंत में घाट पर ही अंतिम क्रिया की सामग्री बेचने वाले एक व्यक्ति को कुछ रुपये दिए और मां का अंतिम संस्कार करने का आग्रह करके चले गए।
वाराणसी। कोरोना संक्रमण ने काशी की मोक्ष परंपरा पर भी संकट खड़ा कर दिया है। अपनों को न मुखाग्नि दे पा रहे, न कपाल क्रिया न अस्थि विसर्जन। अंतिम संस्कार के कर्मकांड रीति-रिवाजों की बात कौन करे श्मशान घाटों की हालत तो यह हो गई है कि यूकेलिप्टस और बांस की लकड़ी से चिता जलाई जा रही है।
काशी के महाश्मशान पर शवदाह के लिए लंबी कतार है तो वहीं स्थानीय लोग अब परिजनों के दाह संस्कार के लिए दूसरे जिलों का रुख कर रहे हैं। काशी में कोरोना से मरने वालों की संख्या ने मुक्तिधाम की व्यवस्था ही ध्वस्त कर दी है। जो लोग जाने में समर्थ नहीं हैं वह ठेकेदारों को अंतिम क्रिया का ठेका देकर चले जा रहे हैं।
काशी के दो श्मशान मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर इन दिनों हालत यह हो गई है कि एक साथ 15-15 चिताएं जल रहीं इसके बावजूद कतार कम नहीं हो रही है। हरिश्चंद्र घाट के विनोद चौधरी ने बताया कि आम दिनों में जहां 10 से 20 शव आते थे वहां इन दिनों संख्या डेढ़ सौ के ऊपर पहुंच रही है। हरिश्चंद्र घाट पर सीएनजी शवदाह गृह तो कभी-कभार चलता था उसको 24-24 घंटे चलाया जा रहा है। मणिकर्णिका घाट पर लकड़ी व्यवसायी हरि ने बताया कि सामान्य दिनों में 50 से 100 शव आते थे, अब इनकी संख्या 300 से 400 रोजाना है।
नहीं मिल रहीं हैं लकड़ियां
काशी में शवदाह के लिए आने वालों को लकड़ियां भी नहीं मिल रही हैं। कफन की कीमत तो चार गुना तक बढ़ गई है। जो कफन 150 से 200 रुपये थी वही अब 800 से 1000 रुपये तक पहुंच गई है। दूसरे जिलों से लकड़ियां मंगानी पड़ रहीं हैं। चिता में नाममात्र की आम की लकड़ी रहती है। यूकेलिप्टस और बांस को भी लोग चिता के हवाले कर दे रहे हैं।
बनाए गए अस्थायी श्मशान
हरिश्चंद्र और मणिकर्णिका घाट पर शवों की बढ़ती संख्या को देखते शहर में अस्थायी श्मशान सामनेघाट पर भी शवों का अंतिम संस्कार शुरू हो गया है। यहां कई कोविड मरीजों के शव भी आ रहे हैं। स्थानीय प्रशासन ने शवों का अंतिम संस्कार जल्द से जल्द करने के लिए यह इंतजाम किया है।
लंबी वेटिंग से जला रहे घाट पर शव
कोरोना पॉजिटिव के शवों के दाह संस्कार का इंतजाम हरिश्चंद्र घाट पर सीएनजी शवदाह गृह में किया गया है लेकिन वहां लंबी वेटिंग की वजह से लोग घाट पर ही शवों को जला दे रह हैं। शवों को लाने वालों से कोई यह भी नहीं पूछता है कि शव किसी कोरोना पाजिटिव का है या नहीं।
जहां कभी कभी जलती थी चिता वहां बुझ नहीं रही आग
बेटावर गांव के रहने वाले लोगों का कहना है कि इस घाट पर शायद हफ्ते में कोई शव जलाने आता था। गांव के लोगों ने कभी ऐसी भयावह स्थिति नहीं देखी थी। पिछले चार, पांच दिनों से यहां 20 से 30 शवों को प्रतिदिन जलाया जा रहा है। मुड़ादेव घाट पर भी प्रतिदिन 10 से ज्यादा शवों को जलाया जा रहा है। रमना गांव में बने शवदाहगृह का रास्ता बस्ती से होने के कारण यहां बाहरी कम जा रहे हैं, लेकिन महीने में कभी चिताओं में आग लगने वाली जगह पर चार से पांच शव प्रतिदिन जलाए जा रहे हैं।
काशी में मृत्यु है मोक्षकारक
काशी विद्वत परिषद के महामंत्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी ने बताया कि मरणं मंगलं यत्र विभूतिश्च विभूषणम, कौपीनं यज्ञ कौशेयं सा काशी केन मीयते। अर्थात जहां मरना मंगलकारी है। जहां की विभूति भी आभूषण है, जहां की राख किसी रेशमी वस्त्र के समान है। पुराणों में वर्णित है कि गंगा तट पर बसी काशी में जिसकी मृत्यु होती है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। अन्यत्र मृत्यु के बाद भी विधि-विधान से काशी के महाश्मशान में अंतिम संस्कार और अस्थि विसर्जन से मोक्ष मिलता है। अंतिम संस्कार के दौरान अपना मुखाग्नि दे, कपाल क्रिया के बाद अस्थि विसर्जन करे तभी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।