मखमली कालीनों के लिए विश्व विख्यात कालीन नगरी के मासूमों को कुपोषण का डंक लग गया है। सरकार के तमाम प्रयास के बाद भी कुपोषित और अति कुपोषित बच्चों की संख्या में कमी नहीं आ रही है। छह माह के अंदर आंकड़ा करीब दो हजार से अधिक बढ़ गया।
पौष्टिक आहार न मिलने से कुपोषित बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। अप्रैल में एक लाख 83 हजार बच्चों में 25 हजार अति कुपोषित तो 50 हजार कुपोषित मिले।
कुपोषण की काली छाया से बच्चों को बचाने के लिए सरकार की ओर से लगातार प्रयास किया जा रहा है। बच्चों को पोष्टिक आहार मिले जिसके लिए बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग की ओर से संचालित आंगनवाड़ी केंद्रों पर पोषाहार समेत अन्य पौष्टिक आहार दिए जाने का प्राविधान है लेकिन उच्चाधिकारियों की उदासीनता से अभियान की हवा निकल गई है।
योजनाओं के संचालन के बाद भी कुपोषित और अति कुपोषित बच्चों की संख्या घटने के बजाए बढ़ रही है। मार्च- अप्रैल में विभाग की ओर से एक से पांच वर्ष के एक लाख 83 हजार बच्चों में एक लाख 77 हजार का वजन किया गया था। जिसमें 25 हजार 553 अति कुपोषित और 50 हजार 151 कुपोषित बच्चे मिले थे। नौनिहालों में बढ़ते कुपोषण से योजनाओं और उसके क्रियान्वयन पर ही सवाल उठने लगा है।
जिला कार्यक्रम अधिकारी अनुपमा शांडिल्य ने कहा कि आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से बच्चों और धात्रियों को पोषाहार समेत अन्य पौष्टिक आहार दिया जाता है। कुछ केंद्रों पर गड़बड़ी होने की सूचनाएं मिल रही है।
ऐसे केंद्रों का अवलोकन कर कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने बताया कि गर्भवती महिलाओं का खान-पान सही न होने से बच्चे कुपोषित हो जाते हैं। भारतीय समाज में गर्भवती महिलाएं अपने खान-पान पर खास ध्यान नहीं देती है जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए।