राम चलत अति भयउ बिषादू। सुनि न जाइ पुर आरत नादू॥ कुसगुन लंक अवध अति सोकू। हरष बिषाद बिबस सुरलोकू॥ श्रीराम के वन की ओर बढ़ते ही भारी विषाद छा गया। नगर का हाहाकर सुना नहीं जा रहा था। लंका में अपशकुन होने लगे, अयोध्या में शोक छा गया। देवलोक में सब हर्ष और विषाद में डूब गए। हर्ष इस बात का था कि अब राक्षसों का नाश होगा और विषाद अयोध्यावासियों के शोक के कारण था।
शनिवार को रामनगर की रामलीला के नौवें दिन राम वनगमन, निषाद मिलन, लक्ष्मणकृत गीता उपदेश का मंचन हुआ। अयोध्या कांड के 57 से 93 तक के दोहे की लीला संपन्न हुई। राम को वन जाते देख लीला प्रेमियों की आंखें नम हो गईं। राम वन के लिए निकले तो लंका में रावण को बुरे सपने दिखाई देने लगे। सीता और लक्ष्मण भी वन जाने को तैयार हो गए। सभी ने समझाने का प्रयास किया, लेकिन वह नहीं माने। कैकेयी के कटु वचन सुनकर दशरथ अचेत हो गए। राम उन्हें प्रणाम करके गुरु वशिष्ठ को अयोध्या की देखरेख करने के लिए कहकर वन चल पड़े। यह देख देवता प्रसन्न हो उठे। होश में आने पर दशरथ सुमंत से पूछते हैं कि राम वन को चले गए। अभागे प्राण शरीर से नहीं जाते किस सुख के लिए भटक रहे हैं। वह रथ लेकर सुमंत को राम को बुलाने के लिए भेजते हैं।
रामनगर की विश्व प्रसिद्ध रामलीला
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भूमि पर शयन करते देख रो पड़े निषादराज
सुमंत रथ लेकर आते हैं और कहते हैं कि राजा की आज्ञा है कि वापस चलें। श्रीराम बहुत सारे लोगों को लौटा देते हैं। अयोध्या के सभी प्राणी व्याकुल हो जाते हैं। रात बीतने के बाद सुबह श्रीराम सुमंत से कहते हैं कि रथ इस प्रकार चलाएं कि मार्ग में पहिये के निशान न मिले। श्री राम लक्ष्मण और सीता जी शृंगेश्वर पहुंचते हैं। निषादराज समाचार पाकर कंद मूल लेकर राम के दर्शन के लिए दौड़ पड़ते हैं। राम से मिलने के बाद वह दंडवत लेट जाते हैं। उन्हें अपने गांव ले जाना चाहते हैं, लेकिन राम वन में ही रहने को कहते हैं। भोजन के बाद राम, सीता भूमि पर शयन करते हैं। यह देख निषादराज रोने लगे तो लक्ष्मण ने उन्हें मोह छोड़कर सीताराम के चरण कमल में अनुराग करने को कहा। इस प्रकार रामगुन गाते-गाते सवेरा हो गया। राम जाग गए। यहीं पर भगवान की आरती के बाद लीला को विश्राम दिया गया है।
रामनगर की प्रसिद्ध रामलीला
अव्यवस्था के चलते फिर बदला गया लीला स्थल
श्रीरामलीला को लेकर दुर्ग प्रशासन द्वारा बरती जा रही उदासीनता के कारण शनिवार को फिर लीला स्थल बदलना पड़ा। जिस जगह निषादराज मिलन की लीला होती है उस जगह पानी, कीचड़ और जलकुंभी लगी हुई थी। रामलीला शुरू होने के दिन से ही लगभग प्रतिदिन बरसात होने के कारण स्थिति और ज्यादा खराब हो गई है। इसके चलते लीला स्थल बदलना पड़ा और गली में लीला और आरती करानी पड़ी।
इसके पूर्व ताड़का वध की लीला का स्थल भी अव्यवस्था के चलते बदलना पड़ा था। इसे लेकर लीला प्रेमी दुखी और आक्रोशित थे। कई बार बरसात के चलते लीला स्थगित करनी पड़ जाती है, लेकिन स्थल कभी भी नहीं बदलता था। इस बार प्रशासनिक मशीनरी कुछ ज्यादा ही लुंजपुंज है। श्रीरामलीला को लेकर संवेदनहीनता जैसी स्थिति है। बस व्यवस्था के नाम पर दुर्ग प्रशासन और पालिका प्रशासन की ओर से खानापूर्ति की जा रही है।