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‘रेड कारपेट’ की जंग, कालीन नगरी में रमाकांत के आने से मुकाबला हुआ रोचक

Sat, 11 May 2019 10:47 AM IST
Vikas Kumar पंकज चौबे, अमर उजाला, भदोही
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रमाकांत यादव (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
डॉलर के रूप में करोड़ों की विदेशी मुद्रा अर्जित कर देश के राजकोष में डालने वाली कालीन नगरी भदोही में सांसदी का मुकाबला दिलचस्प है। ब्राह्मण बहुल सीट पर मोदी मैजिक दिख रहा है तो मायावती का प्रशासनिक प्रबंधन और अखिलेश यादव का काम भी बोलता नजर आ रहा है। आजमगढ़ से चार बार सांसद और चार बार विधायक रहे रमाकांत यादव के कांग्रेस का हाथ थाम कर ‘रेड कारपेट’ की लड़ाई में आने से मुकाबला दिलचस्प बन गया है। पढ़ें आगे की स्लाइड्स में...
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रमेश चंद्र बिंद (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
मिर्जापुर से तीन बार बसपा से विधायक रहे रमेशचंद्र बिंद भाजपा से उम्मीदवार हैं। उन्हें सवर्ण वोट बैंक के साथ खुद की बिंद बिरादरी के वोटों को साधने के लिए उतारा गया है। ब्राह्मणों के बाद यहां बिंद मतदाता ही ज्यादा हैं। हालांकि एससी, मुस्लिम और यादव मतदाता भी निर्णायक भूमिका में हैं। पिछले दिनों बिंद के एक आपत्तिजनक वीडियो से मामला गर्मा गया है। 
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रंगनाथ मिश्र (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
सपा-बसपा गठबंधन से चार बार विधायक रहे पूर्व मंत्री रंगनाथ मिश्र उम्मीदवार हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा सियासी गणित ब्राह्मणों और सवर्ण मतदाताओं को साधने का है। इसके अलावा सपा-बसपा के काडर वोट तो हैं ही। तीनों प्रमुख दलों में अकेले स्थानीय होने के नाते उन्हें इसका लाभ मिलने की भी उम्मीद है। वहीं, कांग्रेस के परंपरागत खिचड़ी वोट बैंक के साथ ही बैकवर्ड लॉबी में मजबूत पकड़ रखने के कारण रमाकांत पिछड़ों में वह दमदार प्रत्याशी माने जा रहे हैं। उनकी नजर निर्णायक तादाद वाले यादव वोटरों पर भी है। हालांकि सपा के काडर वोट को खिसकाना कम चुनौतीपूर्ण नहीं माना जा रहा है।

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : पीटीआई
जाति की बात छोड़ें, करें विकास पर फोकस :
ज्ञानपुर के जिम संचालक और व्यवसायी सुभाष मोदनवाल कहते हैं कि कम से कम नई पीढ़ी को तो देश के विकास के प्रति संजीदगी दिखानी चाहिए। जाति की बात छोड़ विकास पर फोकस करना चाहिए। तात्कालिक लाभ की राजनीति ने आंखों पर पर्दा डाल दिया है। हालांकि अब धीरे-धीरे पर्दा हट रहा है। दूधनाथ मंदिर के समीप चाय की दुकान चलाने वाले जज्जू यादव कहते हैं- ‘भइया सबही लोग बिरादरी देख रहे हैं...तो काहे और कोई पीछे रहे...। जब तक चल रहा है, तब तक तो चलबै करिहे...।’ भिड़िउरा गांव के प्रमोद दुबे कहते हैं कि राजनीतिक दलों का सीट जीतने का पूरा गणित जाति आधारित ही रहता है। वे ज्यादातर बाहरी प्रत्याशी थोपते रहे हैं। यहां की समस्याएं तो कभी चुनावी मुद्दा बन ही नहीं पाईं।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : PTI
भाजपा 5वें से पहले स्थान पर :
वर्ष 2008 में बनी इस संसदीय सीट पर पहली बार हुए चुनाव में वर्ष 2009 में बसपा से गोरखनाथ पांडेय जीते थे। गोरखनाथ को 29.73% जबकि सपा प्रत्याशी छोटेलाल बिंद को 27.76% वोट मिले थे। तब भाजपा प्रत्याशी महेंद्रनाथ पांडेय 5वें स्थान पर रहे थे। हालांकि 2014 में यह सीट भाजपा ने जीत ली।
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