इन लोगों ने बताया कि लाकडाउन फर्स्ट के दिन तो इन लोगों ने परदेश में यह सोचकर काट लिया कि लाकडाउन खत्म होते ही कामधाम शुरू होगा और जिन्दगी जल्द ही पटरी पर लौट आएगी। लेकिन लाकडाउन टू की घोषणा होते ही हिम्मत पस्त हो गई। अंततः हम अपने घरों के लिए निकल लिए और किसी तरह यहां तक पहुंचे।
इसी तरह भीमापार के पूर्व माध्यमिक विद्यालय में ठहरे नीरज गोंड ने बताया कि अभी एक दिन पूर्व ही वह यहां पहुंचा है। विद्यालय अपना है। यहां आने के बाद बचपन की पुरानी यादें ताजी हो गई। लेकिन अभी स्कूल का ताला बन्द है। बाहर ही समय गुजारना पड़ रहा है। दोपहर की भीषण गर्मी में यहां बाहर बरामदे में प्रवासियों को लू का भी सामना करना पड़ रहा है। जबकि मसूदपुर प्राथमिक विद्यालय में क्वारंटीन हुए दो सगे भाई सुरेश विश्वकर्मा मुंबई और राजकुमार विश्वकर्मा बंगलुरू से यहां आकर ठहरे हैं।
लॉकडाउन-2 के बाद जब वे घर को चले तो ट्रेन की टिकट के अलावा उनकी जेब में फूटी कौड़ी भी नहीं थी। क्वारंटीन कर रहे लोगों ने बताया कि इस दौरान लाकडाऊन और सोशल डिस्टेन्सिंग से जुड़े सरकारी निर्देशों का पालन भी वे बखूबी कर रहे हैं। अनौनी प्राथमिक विद्यालय में ठहरे बसन्त यादव ने बताया कि वे मुंबई में नौकरी कर रहे अपने बच्चों का हालचाल लेने गए थे। लेकिन लाकडाउन में वे भी वहां फंस गए। ट्रक में सवार होकरवह किसी तरह गांव पहुंचे। अब क्वारंटीन के रूप में वनवास काट रहे हैं।