डूब क्षेत्र में मनमाना कब्जे कर बनाए गए होटलों और इमारतों के कारण वरुणा नदी असि की राह पर चलते दिख रही है। भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की 211 करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी वरुणा कॉरिडोर परियोजना पर काम शुरू होने से पहले सर्पीले आकार में 50 मीटर से 70 मीटर से भी अधिक चौड़ाई में बहने वाली वरुणा को कॉरिडोर के बहाने 35 मीटर के दायरे में बांध दिया गया।
यह सब तब हुआ, जब वीडीए ने भी महायोजना 2031 में वरुणा किनारे 50-50 मीटर का ग्रीन बेल्ट घोषित किया था।
होटल और शराब कारोबारी हीरालाल जायसवाल के नगर निगम की जमीन के विनिमय के वापस होने के बाद वरुणा की लड़ाई लड़ने वाल संगठनों को बल मिला है। इन संगठनों का दावा है कि यह पूरी योजना ही वरुणा के उद्धार के लिए नहीं, बल्कि किसी भी तरह से डूब क्षेत्र में कब्जा करने वालों को वैध करने के लिए बनाई गई थी।
ग्रीन बेल्ट के नाम पर होटलों का ‘बैक व्यू’ चमकाने का खेल रचा गया था। जानकारों की मानें तो डूब क्षेत्र पर कब्जा जमाने वाले होटल वालों और भू-माफिया को फायदा पहुंचाने के इस खेल में न सिर्फ कार्यदायी संस्था और संबंधित विभागों के अधिकारी शामिल हैं बल्कि शासन के तत्कालीन उच्चाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों का भी दखल था।
दरअसल, परियोजना की शुरुआत से पहले वरुणा का सीमांकन कराया गया और डूब क्षेत्र में 893 अवैध निर्माण चिह्नित किए गए। तब जिम्मेदारों ने दावा किया था कि वरुणा के प्राकृत स्वरूप को कायम रखते हुए कॉरिडोर विकसित करने के लिए यह सब किया जा रहा है।
हुआ इसका उल्टा और इसका किसी के पास जवाब नहीं है। डूब क्षेत्र के अवैध कब्जों को हटाकर कॉरिडोर विकसित किया जाना चाहिए था लेकिन राजनीतिक फायदे की खातिर कब्जे हटवाए बगैर वरुणा के मूल बहाव क्षेत्र को सीमित करने के तरीके पर अमल किया गया।
यही नहीं, कॉरिडोर की आड़ में तलहटी तक घुसकर और कब्जे करा दिए गए। जबकि, नदी के नेचुरल फ्लो की एरिया को छोड़कर दोनों किनारों से 50-50 मीटर तक ग्रीन बेल्ट विकसित किया जाना था।
ऐसा किए जाने पर कई बड़े होटल और भवन डूब क्षेत्र में अतिक्रमण करने वालों में शुमार हो जाते। इन्हें बचाने के लिए नदी की मूल चौड़ाई सीमित कर दी गई।