वाराणसी। मुहर्रम की दूसरी तारीख यानी मंगलवार को भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के हड़हा सराय स्थित उनके पैतृक आवास पर सौ साल कदीमी मजलिस हुई। यहां अजादारों ने शहीदाने करबला को नौहाख्वानी और मातम के जरिये खिराजे अकीदत पेश की। एक दशक पहले शहनाई के उस्ताद ने इस मजलिस की शुरुआत की थी।
मंगलवार को काजिम हुसैन के संयोजन में हुई मजलिस में इमरान अली खां ने साथियों के साथ सोजख्वानी की। फिर सैय्यद अब्बास मुर्तुजा शम्शी ने अपने अंदाज में मर्सिया पेश किया। उन्होंने करबला के जंग और इमाम हुसैन की शहादत का मंजर बयां किया। उन्होंने कहा कि जब इमाम हुसैन करबला में दाखिल हुए तो वह एक जंगल था, लेकिन इमाम हुसैन और उनके साथियों ने शहीद होकर उसे जन्नत बना दिया। अंजुमन हैदरी ने दर्द भरे नौहे पेश किए। इसके अलावा दरगाहे फातमान सहित सभी इमामबाड़ों और घरों में मजलिसें हुईं। मजलिस में उस्ताद के पोते आफाक हैदर, पौत्र सिब्तैन हसन शामिल रहे।