श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में सप्तऋषि आरती के विवाद ने तूल पकड़ना शुरू कर दिया है। काशी विद्वत परिषद और काशी के विद्वानों का कहना है मंदिर की परंपराओं से खिलवाड़ करने का अधिकार किसी को नहीं है। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र और तीन-तीन मंत्रियों का क्षेत्र होने के बावजूद मंदिर की परंपराओं के प्रति लापरवाही उचित नहीं है।
इसके साथ ही आम जनता में भी महंत परिवार को सप्तऋषि आरती की परंपरा के अधिकार को वापस दिलाने की आवाज तेज होने लगी है। काशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष प्रो. रामयत्न शुक्ल का कहना है कि धर्मार्थ मंत्री को संपूर्ण प्रकरण को संज्ञान में लेकर विवाद का पटाक्षेप करना चाहिए।
काशी विश्व की सांस्कृतिक राजधानी है और काशी विश्वनाथ का मंदिर द्वादश ज्योर्तिलिंगों में प्रतिष्ठित शिवलिंग है। यहां के अर्चन, पूजन और भोग राग की शास्त्रसम्मत एक व्यवस्था है। उस व्यवस्था का संरक्षण सरकार का दायित्व बनता है।
यहां की परंपरा और काशी के मंदिरों के जो संस्कार हैं, जो संस्कृति है, उसको ध्यान में रखकर प्रशासन को भी अपने रवैये में बदलाव करना चाहिए, जिससे विश्वनाथ मंदिर की मर्यादा बनी रहे। यहां की छोटी सी भी घटना को पूरे विश्व में देखा जाता है।
महंत परिवार को भी यहां की मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए। कोई ऐसा प्रलाप ना हो, जिससे कि मंदिर की प्रतिष्ठा पर कोई आंच आए। केंद्रीय ब्राह्मण महासभा के अध्यक्ष सतीश चंद्र मिश्र का कहना है कि बाबा विश्वनाथ सभी को सद्बुद्धि दें। इसका राजनीतिकरण ना करें। सत्ता में जो बैठे हैं, वह गुण दोषों के आधार पर निष्पक्ष निर्णय लें।
पूरे मामले को जातिगत रूप दिया जा रहा है, जो गलत है। यह सनातन परंपरा पर प्रहार है। इसके तमाम प्रमाण है कि 1983 से सप्तऋषि आरती की परंपरा महंत परिवार द्वारा निभाई जा रही है और उसमें किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। यह राजतंत्र थोड़े है, जो माफी मांगने की बात की जा रही है।
लोकतंत्र है और संविधान के हिसाब से निर्णय होना चाहिए। जिद पर अड़ जाना ठीक नहीं है। निष्पक्ष विवेचना होनी चाहिए। आवेश में जो भी निर्णय लिया जाता है, वह हितकारी नहीं होता है। जनभावना का हमेशा ध्यान रखा जाना चाहिए। मंदिर में पूर्ववत व्यवस्था लागू करके हाईकोर्ट के जज से पूरे मामले की जांच कराई जानी चाहिए।