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Sawan: काशी विश्वनाथ की कैबिनेट में 11 देव, गणेश विघ्नहर्ता, कार्तिकेय सेनापति और सूर्यदेव कर्मों के साक्षी

Mon, 17 Aug 2026 03:51 PM IST
Pragati Chand हीरालाल चौरसिया, संवाद न्यूज एजेंसी, वाराणसी।

सार

Varanasi News: काशी में बाबा विश्वनाथ की अपनी कैबिनेट है। इसमें 11 देवी और देवता हैं और उनकी अपनी-अपनी भूमिका है। आइए जानते हैं पूरी कहानी
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काशी विश्वनाथ धाम - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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काशी अविमुक्त क्षेत्र है। मान्यता है कि यहां श्रीकाशी विश्वनाथ और माता पार्वती का वास सदैव रहता है। बाबा विश्वनाथ की यहां अपनी कैबिनेट है। इसमें 11 देवी और देवता हैं और उनकी अपनी-अपनी भूमिका है। आधुनिक शासन-व्यवस्था की भाषा में कहें तो बाबा विश्वनाथ इस 'कैबिनेट' के मुखिया हैं और अन्य देवी-देवता अलग-अलग रूपों में उनके मंत्री की भूमिका में हैं जो बाबा के नेतृत्व में अपनी सेवाएं देते हैं। 

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भगवान कार्तिकेय को देवताओं का सेनापति माना जाता है तो गणेश जी विघ्न विनायक के रूप में विघ्नों का निवारण करते हैं। सूर्यदेव को धार्मिक मान्यताओं में कर्मों का साक्षी माना गया है, इसलिए आधुनिक भाषा में उनकी भूमिका सीसीटीवी जैसी समझी जा सकती है।

बाबा के इस 'दरबार' में माता पार्वती भी हैं, जो भगवान शिव की अर्धांगिनी और जगतजननी के रूप में पूजित हैं। विष्णु जी जगत के पालनहार हैं। गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन हैं। वरुणदेव जल के अधिपति माने जाते हैं। हनुमान जी शक्ति, भक्ति और संरक्षण के प्रतीक हैं। वहीं अष्ट भैरव काशी के रक्षक के रूप में पूजे जाते हैं और भगवान शिव के दरबार की सुरक्षा व्यवस्था संभालने वाले देव रूप में माने जाते हैं।

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श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के पूर्व अध्यक्ष प्रो. नागेंद्र पांडेय ने बताया कि माता पार्वती के निवेदन पर भगवान शिव ने पृथ्वीलोक पर बसने के लिए सबसे सुंदर नगरी के रूप में काशी को चुना और गंगा के तट पर आकर बस गए। मान्यता है कि उनके काशी आने के बाद उनकी सेवा में अनेक देवी-देवता और गण भी यहां आ गए। मंगला गौरी मंदिर के महंत पं. नारायण गुरु ने बताया कि बाबा की कचहरी भी काशी में लगती है। इसके मुखिया बाबा विश्वनाथ हैं।

श्रीकाशी विश्वनाथ धाम परिसर में स्थित 'शिव कचहरी' में भक्त अपने कष्टों और समस्याओं से मुक्ति के लिए अर्जी लगाते हैं। मान्यता है कि यहां फरियाद लगाने से न्याय मिलता है। शिव कचहरी नाम से एक अन्य प्राचीन स्थल ब्रह्मा घाट के पास भी स्थित है। 

काशीवासियों से पहले जागते हैं श्रीकाशी विश्वनाथ
श्रीकाशी विश्वनाथ काशीवासियों से पहले जागते हैं। मान्यता के अनुसार, बाबा भोर में करीब ढाई बजे ही जाग जाते हैं, जबकि नेमी भक्त तीन से चार बजे के बीच उठते हैं। ब्रह्म मुहूर्त में बाबा का स्नान-पूजन कराया जाता है। इसके बाद मंगला आरती के साथ भक्तों को दर्शन मिलने लगते हैं। इसके बाद ही काशी के अन्य मंदिरों में मंगला आरती होती है। गौरी केदारेश्वर, महामृत्युंजय, तिलभांडेश्वर, ओंकारेश्वर, सारंगनाथ, मार्कंडेय महादेव, शूलटंकेश्वर और रामेश्वर महादेव सहित अन्य शिवालयों में भी तीन से चार बजे के बीच मंगला आरती के बाद दर्शन शुरू हो जाते हैं। वैसे ज्यादातर मंदिरों में सुबह छह बजे तक श्रृंगार, पूजन और आरती की प्रक्रिया पूरी हो जाती है।

बाबा को खीर, केदारेश्वर को प्रिय है खिचड़ी
श्रीकाशी विश्वनाथ बाबा को खीर अति प्रिय मानी जाती है। वहीं, गौरी केदारेश्वर महादेव को खिचड़ी का भोग जरूर लगाया जाता है। बावा - विश्वनाथ को विभिन्न प्रकार के भोग अर्पित किए जाते हैं। इनमें खीर, दूध, मलाई, मेवा, ठंडई, भांग-बूटी, विभिन्न पकवान और पान आदि शामिल हैं। सावन में हरियाली और मौसम के अनुसार भोग सामग्री में भी बदलाव होता है। मौसमी फल और उनके रस आदि भी बाबा को अर्पित किए जाते हैं। काशी के अन्य शिवालयों में भी लगभग इसी तरह की भोग सामग्री अर्पित की जाती है।

पार्वती
माता पार्वती भगवान शिव की अधांगिनी और जगतजननी हैं। उन्हें शक्ति के स्वरूप के रूप में पूजा जाता है। दुर्गा, भगवती, लक्ष्मी, सरस्वती और काली आदि देवी रूपों में वे जीवों के पालन और रक्षा से जुड़ी मानी जाती हैं।

कार्तिकेय
भगवान कार्तिकेय भगवान शिव के पुत्र हैं। उन्हें देवताओं का सेनापति माना जाता है। कार्तिकेय को सदैव युवा रहने वाला माना जाता है। वे धर्म और न्याय की स्थापना के प्रतीक हैं। उन्हें स्कंद मुरुगन, कुमार, सुब्रह्मण्य और पडानन आदि नामों से भी जाना जाता है।  

नंदी
नंदी भगवान शिव के बाहन और परल भक्त हैं। भगवान शिव के दरबार में वे सदैव उनके सामने विराजमान रहते हैं। उन्हें रक्षक भी कहा जाता है। भगवान शिव के दर्शन से पहले भक्त नंदी के दर्शन करते हैं। उनके माध्यम से बाबा तक अपनी बात पहुंचाने की मान्यता है।

विष्णु
भगवान विष्णु को जगत का पालनहार माना जाता है। बावा की 'कैबिनेट' में वे दीन-दुखियों की रक्षा और पालनकर्ता के रूप में भूमिका निभाते हैं। विष्णु पुराण में भगवान शिव की सेवा विष्णु जी और शिवपुराण में विष्णु जो की सेवा भगवान शिव द्वारा किए जाने का वर्णन मिलता है। स्कंद पुराण में भगवान विष्णु के काशी में 'पोडश केशव' यानी 16 केशव रूपों में विराजमान होने का उल्लेख मिलता है।

गणेश
माता पार्वती के प्रिय पुत्र गणेश जी काशी में अलग-अलग रूपों में विराजमान हैं। काशी में 56 विनायक की परंपरा प्रसिद्ध है। उन्हें विघ्नहर्ता और विघ्नविनायक के रूप में पूजा जाता है। उनकी दो पत्नियां ऋद्धि और सिद्धि मानी जाती हैं। ऋद्धि समृद्धि और सिद्धि आध्यात्मिक उपलब्धियों का प्रतीक मानी जाती है। इसलिए गणेश जी की पूजा से समृद्धि और सिद्धि की प्राप्ति की मान्यता है।

सूर्यदेव
सूर्यदेव पूरे ब्रह्मांड को प्रकाश देने वाले देवता माने जाते हैं। काशी में उनके द्वादश आदित्य स्वरूपों की परंपरा है। वर्ष के 12 महीनों में सूर्य के 12 रूपों की मान्यता है। धार्मिक परंपरा में सूर्य को समस्त कर्मों का साक्षी माना गया है। इसी आधार पर आधुनिक भाषा में उनकी भूमिका सीसीटीवी जैसी कही जा सकती है। सूर्य कालचक्र से भी जुड़े हैं और उनके प्रकाश से पृथ्वी पर जीवन संभव है।

चंद्रदेव
भगवान शिव के मस्तक पर चंद्रमा विराजमान हैं। समुद्र मंथन से निकले विष का पान करने के बाद भगवान शिव को शीतलता प्रदान करने के लिए चंद्रमा के उनके मस्तक पर विराजमान होने की धार्मिक मान्यता है। ज्योतिष में चंद्रदेव को मन, भावनाओं और शीतलता का कारक माना जाता है। सोम, इंदु और निशानाथ उनके प्रमुख नामों में हैं। चंद्रमा को जल, औषधि और वनस्पतियों से भी जोड़ा जाता है।

भैरव
भगवान भैरव को भगवान शिव का रौद्र स्वरूप और काशी का क्षेत्रपाल माना जाता है। अष्ट भैरव के विभिन्न रूपों की भी पूजा होती है। काशी में बाबा कालभैरव को नगर का रक्षक और कोतवाल माना जाता है। भक्त उन्हें निर्भयता और सुरक्षा प्रदान करने वाले देवता के रूप में पूजते हैं।
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हनुमान
हनुमान जी भगवान राम के परम भक्त और शक्ति, भक्ति तथा साहस के प्रतीक हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार वे भगवान शिव के अंशावतार माने जाते हैं। काशी में हनुमान जी के अनेक स्वरूपों की पूजा होती है। वे संकटमोचन के रूप में भक्तों के कष्ट दूर करने वाले देवता माने जाते हैं। उन्हें विरंजीवी भी माना जाता है। रामायण से लेकर महाभारत तक हनुमान जी की उपस्थिति का वर्णन मिलता है।

गरुड़
गरुड़देव भगवान विष्णु के वाहन हैं। हिंदू धर्म में उन्हें पक्षियों का राजा कहा जाता है। वे अपनी अपार शक्ति, गति और भगवान विष्णु के प्रति अगाध भक्ति के लिए जाने जाते हैं। काशी के धार्मिक आख्यानों में भी गरुड़ का विशेष महत्व है। बौद्ध और जैन परंपराओं में भी गरुड का उल्लेख मिलता है।

वरुण
वरुणदेव जल, समुद्र और ऋत के अधिपति के रूप में पूजे जाते हैं। वे जल और नैतिक व्यवस्था से जुड़े देवता माने जाते हैं। उनके हाथों में पाश और शंख या जलपात्र का वर्णन मिलता है। धार्मिक मान्यताओं में वरुण पाप और नैतिक नियमों का उल्लंघन करने वालों को दंड देने वाले देवता के रूप में भी वर्णित हैं। भारतीय नौसेना का आदर्श वाक्य 'शं नो वरुणः' है।
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