पूर्व महंत परिवार के पं. वाचस्पति तिवारी ने बताया कि डॉ. एएस भट्ट ने अपनी किताब दान हारावली में इसका जिक्र किया है कि बादशाह अकबर के बाद टोडरमल ने मंदिर का पुनर्निर्माण 1558 में करवाया था। 1669 में औरंगजेब ने आक्रमण कर इस मंदिर को क्षति पहुंचाई थी। 1777 में इंदौर की राजकुमारी अहिल्या बाई द्वारा इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया था। 18 वीं सदी के दौरान काशी को अपने नियंत्रण में लेने के इच्छुक महादजी सिंधिया जैसे मराठों ने बहुत कोशिश की। उनका प्रयास था कि यह विवाद समाप्त कर लिया जाए। मगर, अंग्रेजों ने कोई पहल नहीं की।
अनादिकाल से बाबा काशी में विराज रहे
वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्या ने बताया कि अनादिकाल से बाबा काशी में विराज रहे हैं। धर्मग्रंथों में महाभारत काल से भी पहले का वर्णन मिलता है। इतिहास की किताबों में 11 से 15वीं सदी के कालखंड में मंदिरों का जिक्र और उसके विध्वंस की बातें भी सामने आती हैं। मोहम्मद तुगलक 1325 ई. के समकालीन लेखक जिनप्रभ सूरी ने किताब विविध कल्प तीर्थ में लिखा है कि बाबा विश्वनाथ को देव क्षेत्र कहा जाता था। लेखक फ्यूरर ने भी काशी के इतिहास को समेटा है। 1460 में वाचस्पति ने अपनी पुस्तक तीर्थ चिंतामणि में मंदिर को लेकर वर्णन किया है।
बता दें कि काशी विश्वनाथ मंदिर के पक्ष में फैसला देते हुए कोर्ट ने ज्ञानवापी परिसर का रडार तकनीक से पुरातात्विक सर्वेक्षण कराने की मंजूरी दे दी है। सिविल जज सीनियर डिवीजन फास्ट ट्रैक कोर्ट आशुतोष तिवारी की अदालत ने बृहस्पतिवार को लॉर्ड विश्वेश्वरनाथ के वाद मित्र विजय शंकर रस्तोगी के आवेदन को स्वीकार कर लिया।