सन 1934 के जुलाई माह में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने काशी विद्यापीठ में एक सप्ताह तक प्रवास कर स्वतंत्रता आंदोलन की पटकथा लिखी थीं। 26 जुलाई से दो अगस्त तक चलने वाले अखिल भारतीय कांग्रेस कार्य समिति और केंद्रीय हरिजन सेवक संघ के अधिवेशन के दौरान गांधीजी विश्वविद्यालय के मानविकी संकाय स्थित कक्ष में ठहरे थे। उस दौरान उन्होंने आजादी के दीवानों को प्रेरणा दी और आजादी के लिए क्रांति की पटकथा तैयार कर दी थी।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान समय-समय पर यहां होने वाली बैठकों में महात्मा गांधी के साथ डॉ. संपूर्णानंद, पंडित जवाहर लाल नेहरू, बाबू शिवप्रसाद गुप्त सहित कई लोग शामिल हुए। यहीं नहीं, गांधी जी ने डॉ. भगवानदास की मौजूदगी में ही 25 अक्तूबर 1936 को भारत माता मंदिर के मुख्य गेट का उदघाटन भी किया था। आंदोलन बापू द्वारा किए जाने वाले आंदोलनों में यहां के छात्रों और शिक्षकों ने भी अहम भूमिका निभाई। आठ अप्रैल, 1930 को बनारस में नमक सत्याग्रह शुरू होने पर काशी विद्यापीठ के वरिष्ठ आचार्य संपूर्णानंद प्रथम अधिनायक चुने गए।
बाद में उनकी गिरफ्तारी होने पर आंदोलन का नेतृत्व शिक्षकों, छात्रों ने संभाला। इसके बाद सत्याग्रह का संचालन विद्यापीठ के स्नातक छात्र रहे लाल बहादुर शास्त्री ने किया। वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन का बिगुल बजते ही नौ अगस्त के बाद एक के बाद एक काशी विद्यापीठ से जुड़े लोग गिरफ्तार किए जाने लगे और 12 अगस्त को राजनीतिक षडयंत्रकारियों की संस्था बताते हुए काशी विद्यापीठ को सील कर दिया गया था।