बनारस के पर्यटन को बढ़ाने के लिए हर सरकार ने योजनाएं तो खूब बनाईं पर परवान नहीं चढ़ सकीं। कई योजनाओं पर काम ठप जैसा पड़ा है। परिणाम, काशी का पर्यटन डेढ़ दिन से ज्यादा का नहीं हो सका। पर्यटन को दो दिन करने के लिए शुरू की गई योजनाएं रफ्तार नहीं पकड़ पा रही हैं। हालांकि सत्ता परिवर्तन के साथ ही काशी की सूरत बदलने की आस लोगों के मन में जग गई है।
पर्यटन क्षेत्र में पिछले कुछ साल में कोई खास काम नहीं हुआ। यह हाल तब था, जबकि अखिलेश यादव की सरकार में इसी महकमे की जिम्मेदारी संभालने वाले ओम प्रकाश सिंह पड़ोसी जिले गाजीपुर के थे। वाराणसी से उनका लगाव रहा है और वाराणसी होकर ही गाजीपुर आते-जाते थे। दूसरी और केंद्रीय पर्यटन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) महेश शर्मा भी महीने में कम से कम एक बार यहां आते रहे हैं।
काशी का पर्यटन डेढ़ दिन का माना जाता है। विदेशी टूरिस्ट सुबह काशी आते हैं। शाम को गंगा आरती और घाट देखते हैं। सुबह बनारस की गलियों में घूम कर दोपहर में सारनाथ पहुंचने के बाद शाम को लौट जाते हैं। यही हाल देशी सैलानियों का भी है। इस अवधि को बढ़ाकर दो दिन का करने के लिए कई योजनाएं उत्तर प्रदेश पर्यटन के क्षेत्रीय कार्यालय में बनी। पहले तो स्वीकृति मिलने में देरी हुई। फिर काम शुरू होने में महीनों गुजर गए। किसी तरह काम शुरू हो गया हुआ तो खत्म होने का नाम नहीं ले रहा।
सबसे महत्वपूर्ण योजना लाइट एंड साउंड शो कई साल से लटकी है। अभी यहां केबल के लिए खुदाई कर छोड़ दिया गया है। इससे पर्यटकों को भी परेशानी हो रही है। इसी प्रकार बुद्धा थीम पार्क का काम तो 10 साल से धीमी गति से चल रहा है। पहले इसका कार्य उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम भदोही इकाई करा रही थी। इसमें जमकर पैसे का खेल हुआ और काम अधूरा रह गया। बाद में जरूरी कार्य का एस्टीमेट तैयार कर उसे प्रसाद योजना के तहत भेजा गया। स्वीकृति भी मिल गई पर काम अभी भी अधूरा है।
अधूरी योजनाओं और असुविधाओं की एक और कारण यह भी है कि क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी को अधिकारियों की आवभगत और वीवीआईपी को दर्शन-पूजन कराने से ही फुर्सत नहीं मिलती है। पर्यटन विकास, प्रोत्साहन और पर्यटकों के लिए सुविधाओं की चिंता जैसे उनका विषय ही नहीं है। वह हर बार कोई न कोई प्रस्ताव भेजने की बात तो बताते हैं लेकिन सुविधाएं बढ़ाने के लिए अब तक किए गए प्रयासों के परिणाम पर चुप्पी साध जाते हैं। हालत यह है कि कई योजनाओं में अब तक हुए कामों का उपयोगिता प्रमाणपत्र संबंधित कार्यदायी संस्थाओं ने नहीं दिया लेकिन इसकी फिक्र किसी को नहीं है।