काशी में कुरुक्षेत्र भी है। हालांकि यहां कभी महाभारत की लड़ाई नहीं हुई थी लेकिन उसी युद्ध स्थली के नाम पर कुरुक्षेत्र कुंड तीर्थ नगरी के जल तीर्थों में से एक है। अस्सी मुहल्ले में स्थित पौराणिक कुरुक्षेत्र कुंड भी अनदेखी का शिकार है। कभी इस कुंड की महिमा इतनी थी कि यहां स्नान के लिए देश के कोने-कोने से श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती थी, अब नशोड़ियों का अड्डा बन गया है।
कुरुक्षेत्र कुंड का जीर्णोद्धार रानी भवानी ने 17वीं शताब्दी में कराया था। लखोरिया ईंट से कुंड के पश्चिमी तट पर तीर्थयात्रियों के लिए नक्काशीदार भव्य धर्मशाला का भी निर्माण कराया गया था। तब पंचकोशी परिक्रमा हो अंतर गृही परिक्रमा असि संगमेश्वर के दर्शन के बाद हजारों भक्त इसी कुंड में डुबकी लगाते थे।
पहला पड़ाव भी इस कुंड के तट पर होता था। तीर्थयात्रियों के ठहराव का शहर के मध्य यह सबसे खूबसूरत स्थल था लेकिन अब खंडहर में तब्दील हो गया है। कुंड के चारों तरफ काई का अंबार है। पानी प्रदूषित हो गया है। कुंड के दक्षिण में पत्थर की कई प्राचीन मूर्तियां हैं जो उपेक्षा के कारण गायब होती जा रही हैं। नगर निगम ने इसके रखरखाव में रुचि तो नहीं ली, अलबत्ता कब्जे की होड़ मच गई। कुंड के तट पर दो तरफ कुल 32 दुकानें भी हैं, जहां कभी सफाई तक नहीं होती।
हालांकि करीब चार बीघा रकबा में स्थित कुंड अभी पूरी तरह सलामत है। वर्षों पहले इस कुंड की सफाई के लिए नागरिकों ने श्रमदान किया था। तब पानी निकाल कर सिल्ट की सफाई कराई गई थी। कुंड की निगरानी करने वाले बब्लू बताते हैं कि सिल्ट की सफाई होते ही कुंड लबालब भर गया था। इतना स्वच्छ जल उसमें आ गया कि फिर पंप से निकालना मुश्किल हो गया था। करीब 23 फीट गहरा यह शहर का जीवित जल स्रोतों वाला कुंड है।