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कंकना के सुरों में निबद्ध हुए अध्यात्म के भाव

Mon, 02 May 2016 02:20 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
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गायन करतीं कंकना बनर्जी
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प्रख्यात शास्त्रीय गायिका कंकना बनर्जी ने रागों-बंदिशों के जरिए संगीत में अध्यात्म के भावों की मिसरी घोल दी। जाने-माने सितार वादक नीलाद्री कुमार ने सितार के तारों पर स्वरों के समन्वय और अपने प्रयोगों से संगीत प्रेमियों पर गहरी छाप छोड़ी तो पं. विश्वमोहन भट्ट ने मोहन वीणा पर अपने सधे अंदाज का ऐसा जादू चलाया कि लोग झूम उठे। दिग्गज कलाकारों को सुनने के लिए मंदिर परिसर में संगीत प्रेमियों का रेला उमड़ा रहा। इसी के साथ छह दिवसीय संकट मोचन संगीत समारोह की आखिरी निशा परवान चढ़ी।
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संकट मोचन के दरबार में आखिरी निशा की शुरुआत कंकना बनर्जी के गायन से हुई। उन्होंने राग हंसध्वनि की अवतारणा की। विंलबित तीन ताल में निबद्ध बंदिश के बोल थे- जय माता अविलंब...। इसी राग में द्रुत तीन ताल में दूसरी बंदिश के बोल- बलमा न जा घर सौतन के...की प्रस्तुति की। इसके बाद पवन पुत्र हनुमान की प्रस्तुति की। अंत में भजन-रघुपति राघव राजा राम...की प्रस्तुति की। इनके साथ तबले पर हारमोनियम पर पं. दिनकर शर्मा, तबले पर सुमित सिन्हा राय ने संगत की। इनके बाद नीलाद्री कुमार ने सितार पर राग झिंझोटी की अवतारणा की।

रूपक ताल में निबद्ध बंदिश में उन्होंने अलाप, जोड़ , झाला के बाद मध्य लय और द्रुत लय की बंदिशें बजाईं। इसके बाद राग मिश्र शिवरंजनी में उन्होंने बेगम अख्तर के दादरा की बंदिश-हमरी अंटरिया पे आजा रे संवरिया देखा देखी तनिक होई जाय रे... पेश किया। इनके बाद कविता कृष्णमूर्ति सुब्रह्मण्यम ने राग पूरिया धनाश्री में भजन की प्रस्तुति की। बंदिश के बोल श्रीरामचंद्र कृपालु भज मन... की प्रस्तुति की। राग भूप में निबद्ध दूसरी रचना लक्ष्मीकांत प्यारे लाल के संगीत पर आधारित थी। बंदिश के बोल थे- ओम नम: शिवाय...। फिर मीराबाई के भजन- जो तूं तोड़े पिया मैं ना तोड़ूं रे...।
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तेरा संग जोड़ी कृष्ण कौन संग तू रे... की प्रस्तुति की। इसके बाद धन्य भाग्य सेवा का अवसर पाया...को सुरों से सजाया। अंत में ठुमरी की बंदिश-काहे छोड़े मोहे गरवा लगाए... से विदा ली। इनके साथ तबले पर पं. तन्मय घोष, मृदंगम पर पं. वेंकट रमण मूर्ति, हारमोनियम पर विशाल डोमल और बांसुरी पर निनाद मुलावकर, मोरसिंग पर सत्यसाई घटसाल ने संगत की। इनके बाद डॉ. एल सुब्रह्मण्यम और अंबी सुब्रह्मण्यम ने वायलिन पर राग यमन की अवतारणा की।  महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र ने कलाकारों को सम्मानित किया
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