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पूरबे से आवे रामा कारी रे बदरिया पछिमे से आवे अंधियरिया...

Sat, 13 Aug 2016 02:05 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला, वाराणसी
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भंवरवा के तोहरे संग जाई.. और कउने खोथवा में लुकइलू आहि रे बालम चिरई... जैसे लोकप्रिय निर्गुणों से लोक गायन की दुनिया में राज करने वाले मदन राय अलग अंदाज में सावन को देखते हैं। उनका कहना है कि सावन जैसा सुहाना कोई मौसम नहीं होता। इस महीने में काले बादलों के बीच आसमान में ऐसी चित्रकारी, ऐसे इंद्रधनुषी रंग नजर आते हैं कि गूंगा भी प्रकृति के रूप को देखकर गुनगुनाने लगे।
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कजरी प्रकृति के ऐसे ही अप्रतिम सौंदर्य और परमानंद से भर देने वाले प्रेम की उपज है। वह कहते हैं कि कजरी संपूर्ण लोक में प्रेम की अनुभूति बन कर छाई रही है। वह बिहार के गांवों में गाई जाने वाली कजरी गुनगुनाते हैं - बदर बरसे मोरा तरसे नयनवां/ कारे कारे बदरा उमड़ि नभ आवे/ तड़पे बिजुरिया जिया डेरवावै..।

वह बताते हैं कि प्रियतम के इंतजार में खड़ी नायिका बादलों से कजरी के जरिए किस तरह संवाद करती है- केनिया से आव तारी कारी रे बदरिया गोइयां केनिया से आवे अंधियरिया ना... पूरब से आवे रामा कारी रे बदरिया गोइयां पछिमे से आवे अंधियरिया ना.../ का लेके आवे ले कारी रे बदरिया गोइयां का लेके आवे अंधियरिया ना../ गरजत आवे रामा कारी रे बदरिया गोइयां तड़पत आवे अंधियरिया ना...।
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वह कहते हैं कि जब पति परदेस में होता है तब नायिका- अपनी पीड़ा को इस तरह व्यक्त करती है- मोरा पिछुअरवा कदमवां के गंछिया रामा/ हरी हरी कइसे निहुरि बहारूं घर आंगनवा रे हरी../ अंगना बहारत मोरा उड़ेला अंचरवा रामा...। वह नशाखोर पिया से परेशान पत्नी के दर्द को भी कजरी में उजागर करते हैं -काहें पिएल शराब बेशुमार पिया/ जरेला हमार जिया ना..। बेचला हंसुली और हुमेल कइल जिंदगी से खेल... झेलि-झेलि दुख काटीला अपार पिया /जरेला हमार जिया ना...।
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