राम के राज्यभिषेक की तैयारी को लेकर अवध में जहां बधावे बज रहे थे, वहीं साज-बाज, बधाई-उत्सव पर मंथरा की कुमति ने एक झटके में पानी फेर दिया। राजतिलक की तैयारी देख कैकेयी के पास पहुंची मंथरा ने उसे याद दिलाया कि तुम्हारे दो वरदान राजा दशरथ के पास पड़े हुए हैं। इसी मौके पर भरत को राजगद्दी और राम को वनवास मांग कर अपनी छाती ठंडी कर लो। अंतत: राम के राजतिलक के फैसले से नाराज होकर कैकेयी कोपभवन में चली गई। कोप भवन के बाद दशरद के मूर्छित होने की लीला के जीवंत भावों पर लीला प्रमियों की आंखें द्रवित हो गईं। मेहताबी रोशनी ने भगवान की आरती हुई तो हजारों की भीड़ हर हर महादेव के जयकारे के साथ धन्य हो उठी।
सुनहु प्रानप्रिय भावत जीका/देहु एक बर भरतहि टीका/मागउं दूसर बर कर जोरी/पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी/तापस बेष बिसेषि उदासी/चौदह बरिस राम बनबासी/माथें हाथ मूदि दोउ लेचन/तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन/अवध उजारि कीन्हि कैकेयी/दीन्हिसि अचल बिपति कै नेई...। रामनगर किले से काशिराज की हाथी पर शाही सवारी निकली और डंका बजा तो हर हर महादेव के जयकारे गूंजने लगे। फिर अयोध्या की कांड की इन्हीं चौपाइयों के साथ रामनगर की रामलीला के मंचन को यादगार बनाया गया। शुरुआत हुई नारद के श्रीराम के पास पहुंचने से। भगवान सीता जी के कहते हैं कि देवी-देवताओं के भले के लिए हम को वन जाने का उपाय करना चाहिए लेकिन पुरवासियों की अभिलाषा है कि राम युवराज बन जाएं। अयोध्या के मैदान मेंकहीं माथे पर तिलक सज रहा था तो कहीं रामायणियों की सस्वर चौपाईयों के साथ लोग पोथी का मिलान कर रहे थे। इस बीच लीला के प्रसंग में राजा दशरथ दर्पण में अपने केस निहारते हुए गुरु वशिष्ठ से कहते हैं कि अब हमारे बाल सफेद हो गए। राम को युवराज बना दिया जाना चाहिए। गुरु वशिष्ठ कहते हैं कि इसमें तनिक भी देरी करने की जरूरत नहीं है। तैयारी शुरू करा दी जाती है। वशिष्ठ राम को दशरथ के मन की बात बताते हैं।
उधर, इंद्र के कहने पर सरस्वती अयोध्या जाकर मंथरा की बुद्धि फेर कर वापस चली आती हैं। अवध में छाई खुशी और बधावा के बारे में पूछने पर मंथरा को जब पता चलता है कि राम का राज तिलक होने वाला है तो उसका कलेजा जल उठता है। वह कैकेयी को समझाती है कि वह इसी मौके पर दशरथ से अपने दोनों वरदान मांग ले। कैकेयी मंथरा के समझाने के बाद कोप भवन में चली जाती है। राजा दशरथ को जब पता चलता है तब वह कोपभवन में जाने की वजह पूछते हैं। कैकेयी उनसे वरदान मांगती है। भरत को राजगद्दी और राम को वनवास का वरदान उसने जैसे ही मांग, दशरथ मूर्छित होकर गिर पड़े।