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हमके सावन में झुलनी गढ़ाय दा पिया जिया बहलाय जा पिया ना...

Thu, 18 Aug 2016 02:34 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
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कजरी के बिना सावन अधूरा है। कजरी का पूरा लोक साहित्य ग्राम्य जीवन की चहक बन कर छाया हुआ है। इसमें सुख-दुख भी है तो शृंगार में संयोग, वियोग दोनों रसों के मर्मस्पर्शी भाव भरे मिलते हैं। लोक मानस में गायन की यह विधा बनारस की देन मानी जाती है। कजरी की कशिश बनारस घराने की उपज मानी जाती है। सावन में रिमझिम फुहारों के बीच नायिका की अभिलाषा को जिस गहराई और जीवटता से लोक कवियों ने इस विधा में पिरोया है, वैसा दूसरे साहित्य में कम देखने को मिलता है। कजरी और सावन के रिश्ते को इस अंक में जानिए बनारस घराने के कलाकार गणेश प्रसाद मिश्र के अनुभवों के जरिए।
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बनारसी ठुमरी के सम्राट कहे जाने वाले पं. महादेव मिश्र के पुत्र गणेश प्रसाद मिश्र बनारस घराने की गायकी में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वह कहते हैं कि पूर्वांचल में कजरी के बिना सावन अधूरा है। कजरी में प्रेम की जैसी उपज मिलती है, वैसी कहीं और नहीं देखी जाती। नायिका के मन की हर खुशी और रंज कजरी में प्रस्फुटित हुए हैं। वह अपनी अभिलाषाओं का वर्णन झूले की पेंग पर कजरी की धुनों के साथ ही करती है। वह कजरी की बंदिश पर सुर लगाते हैं- हमके सावन में झुलनी गढ़ाय दा पिया/जिया बहलाय जा पिया ना...। वर्ष भर की प्रियतम से बंधी उम्मीदें इसी सावन में कजरी के माध्यम से जाहिर होती हैं। सावन की फुहार पड़ते ही मन तरंगित होने लगता है।


रूप-शृंगार की सहज चित्रकृतियां बनने लगती हैं। बादलों के बीच इंद्रधनुषी छठा प्रकृति बिखेरती है तो घर-आंगन में कजरारे नैन जादू डालने लगते हैं। वह कजरी की बंदिश छेड़ते हैं- रिमझिम पड़ेला फुहार हो बदरिया घेरि अइलीं मोर ननदी /सनन सनन नन बहे पुरवइया/झिंगुरा करेला झनकार हो...। प्रेमालाप और पक्षियों के कलरव का संगीत कजरी का सौंदर्य है। वह बनारस घराने की पुरानी कजरी की पंक्तियां पेश करते हैं- हमरे संवरिया नहिं आए आ रे सजनी छाई घटा घनघोर/दादुर बोले पपिहा बोले/कोयल कर रही शोर सजनी/छाई घटा घनघोर...।
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