जमीन में अंडे देने के बाद मादा सीमेंट की तरह झांग छोड़ती है, जिससे गड्ढा बंद हो जाता है। बारिश होते ही अंडे से टिड्डियां तेजी से निकलेंगीं। खाते पीते बड़े होने पर इनका आकार चार इंच तक का होता है। जब इन्हें हरी पत्तियां खाने को नहीं मिलती तो सूखे पत्ते भी खा जाते हैं। इनका रंग बदलता रहता है। पहले हलके मटमैले रंग में होते हैं जो पीले से गुलाबी रंग में भी बदल जाते हैं। गुलाबी रंग में आने के बाद ये लड़ाकू हो जाते हैं।
ऐसे करें टिड्डियों का प्रबंधन
जौनपुर। फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ संदीप कुमार का कहना है कि टिड्डियों के खतरे को देखते हुए किसान नीम आयल पांच मिली प्रति लीटर की दर से फसल पर छिड़काव करें। खेतों में या बगीचों में शोर मचाने वाले यंत्र घंटी, टीन, थाली व डीजे का प्रयोग कर सकते हैं। बाइक या ट्रैक्टर का साइलेंसर निकालकर जोर से आवाज करने पर ये टिड्डियां भाग जाएंगी।
रासायनिक कीटनाशकों में क्लोरपीरिफॉस 20 ईसी 1.25 लीटर प्रति हेक्टेयर , डेल्टामथ्रीन 2.8 ईसी 500 मिली प्रति हेक्टेयर या लैम्डास्यलोथ्रिन 5 ईसी 400 मीली प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें । पानी की मात्रा 500 लीटर प्रति हेक्टेयर इस्तेमाल करना चाहिए। नीम का तेल या नीम गिरी का अर्क बहुत ही प्रभावी होता है। बगीचों में बड़े आम के पेड़ों पर दवा के छिड़काव के लिए पावर स्प्रे का इस्तेमाल कर सकते हैं।
रेगिस्तानी टिड़्डियों के लिए अनुकूल है जौनपुर की मिट्टी
रेगिस्तानी टिड्डियां जमीन में अंड्डा देती हैं। नरम मिट्टी इनके लिए अनुकूल होती है। जौनपुर के अधिकांश इलाकों में बलुई दोमट मिट्टी है जो इन टिड्डियों के लिए अंनुकूल है। इस मिट्टी में आराम से मादा टिड्डी गड्ढे खोदकर अंडे दे सकती है। दूसरी बात यह की लॉकडाउन के चलते शोरसराबा कम है। चारो तरफ शांति है तो यह वातावरण भी इनके लिए अनुकूल है। ये टिड्डियां खाते पीते अंडे देते आगे बढ़ती रहती हैं और इनका कुनबा इसी तरह बढ़ता रहता है।
टिड्डी दल का प्रकोप महामारी का स्वरूप ग्रहण कर लेता है। ऐसी स्थिति में इलाज से पूर्व बचाव अपनाना ही बेहतर है। किसान निरंतर टिड्डी दल के आक्रमण की निगरानी करते रहें, ताकि किसी भी स्तर पर प्रकोप की दशा में तत्काल टिड्डी दल पर नियंत्रण पाया जा सके। -राजेश कुमार राय, जिला कृषि रक्षा अधिकारी।