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जरा याद करो कुर्बानी: स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की शरण स्थली होती थी गंगापुर, बनाते थे आंदोलन की रणनीति

Sun, 14 Aug 2022 12:30 PM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी

सार

वाराणसी के गंगापुर का क्षेत्र आजादी की लड़ाई के दौरान स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की शरण स्थली होती थी। गंगापुर व आसपास के इलाकों में रह कर आजादी के दीवाने आंदोलन की रणनीति बनाते थे।
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पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और संपूर्णानंद जी - फोटो : फाइल
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विस्तार
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वाराणसी के गंगापुर का क्षेत्र आजादी की लड़ाई के दौरान स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की शरण स्थली होती थी। गंगापुर व आसपास के इलाकों में रह कर आजादी के दीवाने आंदोलन की रणनीति बनाते थे। जिले के युवा, छात्रों के साथ-साथ आसपास के आंदोलनकारी भी यहां छिपकर अपनी गतिविधियां चलाते थे। गंगापुर में जहां पुरानी रजिस्ट्री कार्यालय पर स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देते हुए भारतीय झंडा फहराया था।

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गंगापुर के हृदय नारायण सिंह, घमहापुर के लालजी सिंह, मोती कोट के सुभाष सिंह बताते हैं कि शहर में अंग्रेजों भारत छोड़ो का आंदोलन चलाने वाले संपूर्णानंद जी, श्री प्रकाश सिंह, लाल बहादुर शास्त्री सहित तमाम बड़े नेता फरारी के दौरान गंगापुर, गंजारी और बड़ी बारी के आसपास आकर रहते थे।

गंजारी के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे लालधर दुबे के खेत व बगीचे में सेनानियों की जुटान होती थी। यहीं से आंदोलन की रूपरेखा तय की जाती थी। यहां के उम्रदराज लोग बताते हैं कि गिरफ्तारी से बचने के लिए ये लोग कभी खेतों में काम करते तो कभी गाय भैंस चराते थे। गंजारी के लालधर दुबे अग्रिम पंक्ति के आंदोलनकारी थे, यहीं के पंडित कृष्ण देव उपाध्याय, सीताराम शास्त्री तथा गंगापुर बाजार के रामदेव सिंह, दुखरन सेठ, छेदी पांडेय, आजाद श्रीवास्तव, भट्टी के महादेव सिंह, मोती कोट के राजनारायण सिंह, अंबिका प्रसाद सिंह, दिनदासपुर के शोभनाथ सिंह, हरसोस के बलदेव प्रसाद तथा रामप्रसाद मौर्य भी आजादी के दीवाने और रणबांकुरे थे।

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डीह गंजारी के सेनानी सीताराम शास्त्री बताते हैं कि लालधर दुबे के यहां शहर के बड़े नेता आते थे और यहीं से गांव-गांव पर्ची वितरित करने तथा आंदोलन को आगे बढ़ाने की रणनीति बनती थी। कई बार श्री प्रकाश सिंह, लाल बहादुर शास्त्री, संपूर्णानंद जी गांव में आए थे। फरारी के दौरान लोग यहां नाम और वेष बदलकर रहते थे। सभी बड़े नेता लालधर दुबे और पंडित कृष्ण उपाध्याय को निजी तौर पर जानते थे।

योजनाबद्ध तरीके से काम करने के कारण मिली थी मंत्री की उपाधि
घमहापुर के लालजी सिंह बताते हैं कि भट्टी गांव के महादेव सिंह बढ़-चढ़कर आंदोलन में हिस्सा लेते और अपनी रणनीति बनाते। साथियों ने उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ही योजनाबद्ध तरीके से काम करने के लिए मंत्री जी की उपाधि दी थी। 

मोती कोट गांव के सुभाष सिंह बताते हैं कि उनके पिता अंबिका प्रसाद सिंह ने गंगापुर के आसपास युवाओं को लेकर अंग्रेजों भारत छोड़ो व स्वतंत्रता प्राप्ति का आंदोलन चलाया। जबकि चाचा राज नारायण सिंह काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के छात्रों के साथ आजादी के आंदोलन में सक्रिय थे। बीएचयू के छात्र नेता गंगापुर भी आते और यहां पढ़ने वाले छात्रों को आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करते थे।

नेताओं के रुकने का करते थे प्रबंध
गंगापुर के हृदय नारायण सिंह ने बताया कि मेरे पिता रामदेव सिंह आजादी के दौरान दिल्ली में गांधी आश्रम के प्रबंधक के रूप में कार्य करते थे। वे बनारस से और उत्तर प्रदेश से दिल्ली पहुंचने वाले नेताओं के रुकने और खाने का प्रबंध किया करते थे। इस कारण उन्हें दिल्ली से उस समय गिरफ्तार कर लिया गया जब वह आश्रम से मेस में खाना खाने जा रहे थे। गंगापुर के आसपास के ही हरसोस गांव के बलदेव प्रसाद तथा राम प्रसाद मौर्य भी सेनानी थे। बलदेव प्रसाद बाद में गंगापुर के विधायक बने जबकि राम प्रसाद मौर्य को लोग स्वराज आंदोलन से जुड़े होने के कारण सुराजी मौर्य के नाम से पुकारते थे।
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जूनियर हाईस्कूल के छात्र ने फहराया था ध्वज

दीनदासपुर के शोभनाथ सिंह ने गंगापुर रजिस्ट्री कार्यालय पर जूनियर हाईस्कूल का छात्र होने के दौरान ध्वज फहराया था। शोभनाथ सिंह के पुत्र महेंद्र सिंह एडवोकेट बताते हैं कि पिताजी ने गिरफ्तारी से बचने के लिए अभिलेखों में कई जगह अलग-अलग नाम लिखवाए। कहीं शोभनाथ सिंह तो कहीं शोभू सिंह नाम अंकित मिलता है। बताया कि तब उन्हें पकड़े जाने के बाद जेल और दस रुपये की सजा दी गई थी। दस रुपये नहीं देने पर जेल की अवधि एक माह और बढ़ा दी गई थी। 
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