वैष्णवजन के घरों में भी इसी नियम का पालन होता है। इस्काॅन मंदिर के मनीष प्रभुदास ने बताया कि जन्माष्टमी के चार दिन पहले से ही प्रसाद बनने लगता है। वृंदावन से ट्रेनिंग लेने वाले कारीगर ही प्रसाद तैयार करते हैं। उनको वहां सात्विक प्रसाद बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। हरे कृष्ण हरे राम संकीर्तन सोसाइटी के अध्यक्ष कृष्ण प्रसाद दास ने बताया कि एक सप्ताह पहले से ही पेड़े और लड्डू बन रहे हैं।
60 क्विंटल बनेगा लड्डू, पेड़ा और हलवा: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर शहर में 60 क्विंटल से अधिक लड्डू, पेड़ा और हलवा बनेगा। इनमें गोपाल मंदिर, इस्काॅन मंदिर और संकीर्तन सोसाइटी की ओर से 30 क्विंटल से ज्यादा तैयार होता है। गोपाल मंदिर में एक हजार से अधिक भक्तों को प्रसाद दिया जाता है।
भोग बनाने के ये नियम
गोपाल मंदिर के तीसरी मंजिल के बंद कमरे में प्रसाद बनता है। कारीगर स्नान और भोजन करके प्रसाद बनाना शुरू करते हैं। इस दौरान वो किसी सगे संबंधी से नहीं मिल सकते। उस कमरे में कारीगरों के अलावा कोई प्रवेश नहीं कर सकता है। अगर एक बार बाहन निकले तो दोबारा कमरे में जाने से पहले स्नान करना होता है। इस्काॅन मंदिर में प्रसाद को छूने के लिए इस्काॅन के नियमों का पालन करना पड़ता है। नशा, जुआ और शेयर मार्केट से दूर रहने और मांस-मदिरा के अलावा लहसुन-प्याज तक का सेवन न करने वाला ही प्रसाद छू सकता है।
असम, ओडिशा, बंगलूरू और वृंदावन से आते हैं कारीगर
काशी में प्रसाद बनाने के लिए वृंदावन के अलावा अन्य राज्यों से भी कारीगर आते हैं। गोपाल मंदिर में बनारस के अलावा प्रयागराज और लखनऊ के कुल 20 कारीगर हैं। यह कारीगर औदीच्य ब्राह्मण ही होते हैं। वही भोग बना सकते हैं। इस्काॅन मंदिर में असम, ओडिशा, बंगलूरू और वृंदावन के कारीगर प्रसाद बना रहे हैं।