वाराणसी। दो दिन से चौतरफा लोग नटखट कन्हैया के जन्मोत्सव को लेकर भक्ति भाव में डूबे हुए थे। वहीं, पांच नन्हे-मुन्ने लाड़-प्यार, दुलार और शरारत की उम्र में जिला जेल की सलाखों के पीछे कैद हैं। हालांकि इसमें इन नन्हे-मुन्नों का कोई कसूर नहीं है, बल्कि यह दहेज हत्या सहित अन्य आपराधिक मामलों की आरोपी अपनी मांओं के कर्मों के चलते किस्मत के मारे हैं। छह साल से कम उम्र होने और पालन-पोषण का कोई अन्य आसरा न होने के कारण इन मासूमों का जेल में ही मां के साथ रहना मजबूरी है।
जिला जेल में मौजूदा समय में 84 महिला बंदी निरुद्ध हैं। वहीं, पांच महिला बंदी शिवपुर स्थित अस्थायी जेल में निरुद्ध हैं। जिला जेल में पांच महिला बंदियों के बच्चे भी उनके साथ रह रहे हैं। प्रत्येक महिला बंदी से इन नन्हे-मुन्नों को प्यार और दुलार खूब मिलता है, लेकिन इनकी पूरी दुनिया महिला बैरक तक ही सीमित रहती है। जानकारों का कहना है कि जेल के अजीबोगरीब माहौल और आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के बीच रहने के कारण इन बच्चों के मानसिक विकास पर बहुत गलत प्रभाव पड़ता है। हालांकि, किया भी क्या जा सकता है। अपनी मांओं के चलते यह मासूम बाहर की दुनिया देख और समझ न पाने की कीमत चुका रहे हैं।
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खाने-पीने से लेकर पढ़ाई तक का रखते हैं ध्यान
जिला जेल अधीक्षक पवन कुमार त्रिवेदी ने बताया कि कारागार में मांओं के साथ रहने वाले छह साल तक की उम्र के बच्चों के दूध से लेकर पौष्टिक भोजन तक का विशेष ध्यान रखा जाता है। उनके खेलने और पढ़ने की व्यवस्था भी की जाती है। बीच-बीच में सामाजिक संस्थाओं के लोग इन बच्चों के लिए चॉकलेट और उपहार वगैरह भी लेकर आते रहते हैं। प्रयास यही रहता है कि इन बच्चों पर जेल के माहौल का असर न पड़े और आगे चलकर यह अच्छे नागरिक बनें। फिर भी हकीकत तो यही है कि जेल तो जेल ही होती है।
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जेल में मां के साथ रहने वाले बच्चों के मानसिक विकास पर नकारात्मक असर पड़ता है। सामान्य बच्चों की तुलना में जेल में मांओं के साथ रहने वाले बच्चे अवसाद के भी शिकार हो जाते हैं और उनके गलत राह पर चलने की आशंका बढ़ जाती है। हालांकि हर मां यह चाहती है कि उसका बच्चा उसकी नजरों के सामने ही रहे। पांच साल तक के बच्चे को उसकी मां से दूर रखने पर भी उस पर गलत असर पड़ता है। ऐसे में इन बच्चों का जेल में रहना मजबूरी है। फिर भी जेल प्रशासन और मां को यह प्रयास करते रहना चाहिए कि बच्चे पर नकारात्मकता न हावी हो और वह आगे चल कर समाज की मुख्य धारा से जुड़ कर सकारात्मक काम करें। ऐसे बच्चों की काउंसिलिंग भी बहुत जरूरी है।
- डॉ. बनानी घोष, मनोवैज्ञानिक, मंडलीय मनोविज्ञान केंद्र