बनारसी साड़ी की पूरी दुनिया में धूम यूं ही नहीं। पीढ़ियों की लगन और मेहनत से तराशी गई परंपराओं के इस शिल्प की एक चमक आप रामनगर में देख सकते हैं। जैसे बनारसी साड़ी की बेहद खूबसूरत कारीगरी के मुरीद हैं, वैसे ही उस शिल्प को कलेजे से लगाए कला साधक भी।
रामनगर के साहित्यनाका के 90 वर्षीय जगन्नाथ प्रसाद ऐसे ही शिल्पियों में हैं, जिन्होंने बनारसी शिल्प की पुश्तैनी कला को न सिर्फ आजीविका के लिए अपनाया बल्कि अपनी साधना और मेहनत से उसे नई ऊंचाई तक ले गए।
आज उनके यहां तैयार बनारसी साड़ियां दुनिया के आधा दर्जन से अधिक देशों तक जाती हैं। पांच पीढ़ियों से चली आ रही पुश्तैनी विरासत को अब नई पीढ़ी भी नए प्रयोग और नई तकनीक के साथ सहेजने के लिए तैयार है। जगन्नाथ प्रसाद का पूरा कुनबा बनारसी साड़ी के कारोबार से जुड़ा है।
रामनगर के इस मास्टर शिल्पी ने भी दूसरे शिल्पियों की तरह कई उतार-चढ़ाव देखे। बताया कि कई बार ऐसी स्थितियां आईं जब यह लगा कि कोई और काम शुरू किया जाए लेकिन पुश्तैनी शिल्प से नाता इतना गहरा जुड़ चुका था कि कभी छोड़ते नहीं बना।