अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान केंद्र (आईआरआरआई) का वाराणसी में स्थापित होने वाला दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय केंद्र अगले साल जनवरी में देश के अकेले राष्ट्रीय बीज अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र (एनएसआरटीसी) में काम शुरू कर देगा। केंद्र की स्थापना के लिए निरीक्षण-परीक्षण की औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं। फार्म और प्रयोगशालाएं स्थापित करने की रूपरेखा के साथ-साथ गुणवत्ता परीक्षण और रिमोट सेंसिंग पर भी काम अंतिम चरण में है।
उपकरण आने के बाद शोध का कार्य शुरू हो जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में इस केंद्र की स्थापना का उद्देश्य नई प्रजातियां विकसित करने, सीमित संसाधनों में उत्पादकता बढ़ाने, चावल की गुणवत्ता बढ़ाने के साथ-साथ किसानों का मुनाफा बढ़ाना है।
केंद्र के शुरू होने के बाद गांवों को गोद लेकर शोध और प्रदर्शन कार्य के साथ-साथ यहां अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रशिक्षण शुरू हो जाएगा। पिछले दिनों एनएसआरटीसी में विपरीत जलवायु में गुणवत्तायुक्त चावल का उत्पादन बढ़ाने के लिए कंबोडिया के एक दल के प्रशिक्षण के साथ इसकी शुरूआत हो चुकी है।
बीएचयू का कृषि विज्ञान संस्थान भी मदद कर रहा है। केंद्र का फोकस इस बात पर होगा कि पूर्वी भारत के साथ-साथ नेपाल, बांग्लादेश और अफ्रीकी देशों में ऐसे चावल का उत्पादन बढ़ाया जाए, जिसमें आर्सेनिक और भारी धातुओं की कमी हो और मिनरल्स ज्यादा हों।
इस तरह से पूर्वी भारत में कुपोषण की समस्या से निपटा जा सकेगा। गौरतलब है कि पूर्वी और दक्षिणी भारत में चावल मुख्य खाद्य पदार्थ है, जबकि धान का उत्पादन पंजाब और हरियाणा में ज्यादा होता है।
पूर्वी भारत के राज्यों में धान की खेती वर्षा पर निर्भर करती है। कभी बाढ़ तो कभी सूखे के कारण दक्षिण भारत की तरह पूर्वी भारत में धान की अच्छी खेती नहीं हो पाती है। जो धान पैदा होता भी है, उसके चावल उन्नत किस्म के नहीं होते हैं।