उधर, करोमा गांव की विश्वकर्मा बस्ती में हर घर में लकड़ी की नक्काशी का काम होता है। प्रेम शंकर विश्वकर्मा, चंद्रप्रकाश विश्वकर्मा, ओमप्रकाश शर्मा, घनश्याम और गणेश प्रसाद जैसे कारीगर बताते हैं कि युद्ध शुरू होने के बाद से वुड कार्विंग उद्योग पर सीधा असर पड़ा है।
कारीगर अमित कुमार विश्वकर्मा बताते हैं कि कैम लकड़ी से बुद्ध प्रतिमाएं, अशोक स्तंभ, पेन स्टैंड और अन्य सजावटी सामान बनाए जाते हैं जिनकी विदेशों में हमेशा मांग रहती थी लेकिन अब ऑर्डर रुक गए हैं। शिल्पी प्रेमशंकर विश्वकर्मा बताते हैं कि पहले कैम लकड़ी 300 रुपये प्रति वर्ग फीट मिल जाती थी जो अब बढ़कर 1500 से 2000 रुपये तक पहुंच गई है। विदेशी ऑर्डर बंद होने से कारीगरों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।