Varanasi News: बनारस में यदि चाय की बाद की जाए तो हर गली-नुक्कड़ पर इसकी दुकान और सोनहट जैसी खुशबू लोगों को मन को भा जाती है। यही चाय अगर घाट यानी गंगा किनारे पी जाए तो इससे बड़ा सुकून और कुछ हो ही नहीं सकता। ऐसे लोगों को चाय प्रेमी भी कहा जाता है। जब मन आया निकल गए अस्सी या दशाश्वमेध घाट की तरफ और लगने लगती हैं चाय की चुस्कियां।
तुम पूनम मैं अमावस तुम कुल्हड़ वाली चाय मैं बनारस...। बनारस और चाय का नाता भी कुछ ऐसा ही है। अस्सी से लेकर राजघाट तक बनारस की गलियों में चाय के तरह-तरह के स्वाद मिल जाएंगे। कहीं इंजीनियर की चाय, कहीं बेवफा चाय, कहीं बदनाम चाय, कहीं भैयो की चाय तो कहीं पप्पू की चाय के दीवाने काशी तक खींचे चले आते हैं।
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अस्सी पर पप्पू की चाय की दुकान को हाजमोला चाय का जन्मस्थान कहा जाता है। नींबू वाली चाय जब जुबान से नीचे उतरती है तो एक नए स्वाद का अहसास करा जाती है। अंग्रेजों के जमाने से चल रही पप्पू की चाय की दुकान पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी चाय की चुस्की ले चुके हैं।
इसके बाद बात करते हैं शहर में 80 साल पुरानी लक्ष्मी चाय की। 1950 से संचालित लक्ष्मी प्रसाद चौरसिया की दुकान पर कुल्हड़ चाय के साथ कोयले के चूल्हे पर सेंकी हुई ब्रेड के स्वाद की बात ही कुछ और है। चाय की दुकान की जिम्मेदारी तीसरी पीढ़ी संभाल रही है।
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इसके बाद दशाश्वमेध घाट के पास बंगाली टोला वाली गली में भैयाजी चाय का स्वाद तो बेमिसाल है। खालिस दूध से बनने वाली चाय का स्वाद जुबान पर चढ़ने के बाद उतरेगा ही नहीं। केवल दूध में बनने वाली चाय में तुलसी स्वास्थ्य और स्वाद को और बेहतर कर देती है।
आनंदबाग में 40 साल पुरानी दुकान काशी कैफे पर स्पेशल चाय परोसी जाती है। तीन साल पहले अस्सी पर शुरू हुई इंजीनियर चाय तीन साल में युवाओं की पसंदीदा बन चुकी है। दुकान के संचालक अमन जैन ने बताया कि युवा इंजीनियर मसाला और केसर इलायची को सबसे ज्यादा पसंद करते हैं।
उनके पास 10 तरह की चाय उपलब्ध है। इसमें बनारसी पान की चाय, गुलाब इलायची चाय, केसर इलायची, चाकलेटी चाय, बटर स्कॉच, तुलसी चाय, स्पेशल तुलसी जिंजर, इंडियन मसाला चाय उपलब्ध हैं।