अमरेश कुशवाहा कहते हैं कि जरी महंगी होते ही हैंडलूम पर बनने वाली बनारसी साड़ियों की कीमतें आसमान छूने लगी हैं। इसका सीधा असर बड़े-बड़े शोरूम पर पड़ा है, जहां पहले पूरी शुद्ध बनारसी साड़ियों की अच्छी बिक्री होती थी। अब ग्राहक साड़ी पसंद तो करता है, लेकिन कीमत सुनते ही पीछे हट जाता है।
शादी-ब्याह में भी बनारसी साड़ी की खरीद बहुत कम हो गई है। उन्होंने बताया कि पहले टाटा और रिलायंस के ऑर्डर आते थे, अब बंद हो गए हैं। हम बुनकरों को काम नहीं दे पा रहे हैं। अब हैंडलूम पूरी तरह बंद की कगार पर है। लगभग 8 हजार ही हैंडलूम अब बचे होंगे।
यूपीका के अध्यक्ष अमरेश कुशवाहा के अनुसार, बनारस के बाजारों में सूरत की साड़ियां ज्यादा बिक रही हैं। सस्ती होने की वजह से ग्राहक उधर जा रहा है और बनारसी कारीगरों की हैंडलूम साड़ियों को पूछने वाला कोई नहीं है। सरकार इसके लिए कुछ नहीं कर रही है। लोगों को जागरूक करना जरूरी है कि बनारसी साड़ी की पहचान कैसे करें।
आजकल प्लास्टिक की जरी वाली साड़ियां बेची जा रही हैं और पावरलूम की साड़ियां हैंडलूम की बताकर बेची जा रही हैं। सहकार भारती के बुनकर प्रकोष्ठ के प्रदेश प्रमुख शैलेश प्रताप सिंह बताते हैं कि मशीन से बनी साड़ियों में लागत को किसी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन हैंडलूम में ऐसा संभव नहीं है। शुद्ध जरी, महीनों की मेहनत और कारीगर की कला मिलकर साड़ी को महंगा बनाते हैं।
जरी की महंगाई ने बिगाड़ा साड़ी का गणित
बनारसी साड़ी में इस्तेमाल होने वाली शुद्ध जरी ही इसकी सबसे बड़ी पहचान है। पहले एक जरी वाली साड़ी में करीब 600 ग्राम चांदी लगती थी और इसकी कीमत लगभग 60 हजार रुपये हुआ करती थी। अब वही जरी बढ़कर लगभग 1 लाख 40 हजार रुपये तक पहुंच गई है। जरी की कीमत दोगुनी से ज्यादा होने पर शुद्ध जरी वाली साड़ियों की लागत बढ़ गई और बाजार से इनकी मांग तेजी से घटने लगी।
बनारसी साड़ी बनाम सूरत की साड़ी
बनारसी हैंडलूम साड़ी जहां महीनों की मेहनत, शुद्ध जरी और कारीगरी की कला से तैयार होती है, वहीं सूरत की साड़ियां मशीन से कम समय में और कम लागत में बन जाती हैं। कीमत में बड़े अंतर के कारण ग्राहक तेजी से सूरत की साड़ियों की ओर जा रहा है। इसका नतीजा यह है कि बनारस के ही बाजारों में बनारसी कारीगरों की साड़ियों की जगह सूरत की साड़ियां बढ़ती जा रही हैं, जिससे स्थानीय हैंडलूम उद्योग सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है।