लेखक का नाम प्रकाशित नहीं है। लेखक के स्थान पर केवल विषय विशेषज्ञ द्वारा लिखा गया है। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि विवादित टिप्पणी की जिम्मेदारी किसकी है और पाठ्यक्रम में शामिल करने से पहले सामग्री की शैक्षणिक समीक्षा किस स्तर पर हुई।
पुस्तक में प्रकाशित ये सामग्री नितांत आपत्तिजनक है। भारतीयों के तर्क क्षमता की मिसाल तो विदेशों में दी जाती है। भारत के निर्णय सिंधु ग्रंथ ने पूरे विश्व को राह दिखाई। यह भारतीयों और भारत की मनीषा का अपमान है। -प्रो. प्रेम नारायण सिंह, निदेशक, आईयूसीटीई
भारतीय समाज को सामूहिक रूप से तर्क और निर्णय लेने में अयोग्य घोषित कर देना न केवल तथ्यात्मक रूप से संदिग्ध है बल्कि विद्यार्थियों में आत्महीनता की भावना भी पैदा कर सकता है। देश के नागरिकों को सर्वदा अयोग्य बताना अकादमिक दृष्टि से भी उचित नहीं माना जा सकता। -प्रो. योगेंद्र सिंह, पूर्व कुलपति, जननायक चंद्रशेखर विवि, बलिया
ये मेरे संज्ञान में नहीं आया है। यदि ऐसी कोई टिप्पणी है तो यह गलत टिप्पणी है। इसे दिखवाया जाएगा। जांच भी कराई जाएगी। -ज्ञानेंद्र कुमार, कुलसचिव, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय