कर्नल निजामुद्दीन की प्राथमिक शिक्षा घर पर ही हुई। उन्होंने दीनी तालीम पाई थी। बचपन गांव में ही गुजरा। युवावस्था में वह सिंगापुर चले गए। वहां उनके पिता इमाम अली कैंटीन चलाते थे। सिंगापुर पहुंच कर वह पिता का हाथ बंटाने लगे।
द्वितीय विश्वयुद्ध के कुछ दिनों पहले वह ब्रिटिश आर्मी में भर्ती हो गए। ब्रिटिश आर्मी और जापान के बीच जब युद्ध चल रहा था एक दिन ब्रिटिश आर्मी चीफ ने फौज को निर्देश दिया कि भारतीय भरे मर जाएं लेकिन ब्रिटिश खच्चर नहीं मरना चाहिए।
यह सुनकर निजामुद्दीन का मन ब्रिटिश सेना के प्रति घृणा से भर गया। वह नेताजी सुभाषचंद्र बोस के पास पहुंचे और अपनी व्यथा सुनाई। नेताजी ने उनको आजाद हिंद फौज में भर्ती कर लिया। साथ ही उन्हें कर्नल की उपाधि भी दी। वह नेताजी के चालक के साथ ही अंगरक्षक भी बन गए।
1943 में सिंगापुर के कैथो हॉल में नेताजी ने तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा का नारा देने के साथ ही कई देशों का पनडुब्बी से भ्रमण किया। कर्नल निजामुद्दीन इस दौरान नेता जी के साथ रहे। वह टोक्यो में नेताजी के साथ जापान के प्रधानमंत्री तोजो से मिले।
वहां नेताजी ने जापान से आजाद हिंद फौज के लिए मदद मांगी। जर्मनी यात्रा के दौरान नेताजी ने हिटलर से निजामुद्दीन का परिचय बहादुर और अच्छे निशानेबाज के रूप में कराया था। हिटलर ने कर्नल निजामुद्दीन के निशानेबाजी की परीक्षा ली और उससे प्रभावित होकर उन्हें एक गन भेंट की।