दुनियाभर के मूर्ति तस्करों, अपराधियों के निशाने पर भारत की सांस्कृतिक राजधानी काशी है। मंदिरों और घाटों के लिए दुनियाभर में मशहूर बनारस में आए दिन बेशकीमती मूर्तियों और ऐतिहासिक धरोहरों को चोरी कर विश्व बाजार में बेचा जा रहा है।
वाराणसी के अस्सी स्थित कुरुक्षेत्र तालाब के सामने स्थापित पंचरत्न मंदिर से गुरुवार की सुबह डेढ़ सौ साल पुरानी डेढ़ फीट की श्रीकृष्ण की अष्टधातु की मूर्ति चोरी हो गई।
पुलिस ने मंदिर परिसर स्थित होटल के सीसीटीवी फुटेज खंगाले तो तीन युवक मंदिर में घुसते और फिर जैकेट में छिपाकर मूर्ति ले जाते दिखे। अंतरराष्ट्रीय बाजार में चोरी गई मूर्ति की कीमत एक करोड़ रुपये से ज्यादा है।
काशी की ऐतिहासिक धरोहरों के गायब होने का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले नवंबर, 2013 में कबीरचौरा मठ मूलगादी से संत कबीरदास की छह सौ साल पुरानी तुलसी की माला चोरी हो गई थी।
लामा के वेश में पहुंचे छह तस्करों ने पूजापाठ के बहाने कबीर की माला चुराई थी। मामले को लेकर थाईलैंड के तीन तस्करों को पुलिस ने गिरफ्तार भी किया लेकिन उनसे यह नहीं पता चल सका कि आखिर माला कहां गई।
इसके साथ ही, ढुंढिराज गणेश की चरण पादुका जुलाई, 2011 में चोरी हुई थी जो कुछ ही दिनों बाद गोदौलिया कूड़ाघर में मिली। जंगमबाड़ी मठ से अगस्त, 2013 शिवलिंग चोरी हुआ था। उसका अब तक पता नहीं चला। वहीं, दिसंबर, 2013 में कंदवां स्थित कर्दमेश्वर महादेव मंदिर से पीतल व अष्टधातु से निर्मित अरघे का कुछ हिस्सा चोर काट ले गए थे।
हांगकांग में बनते हैं चोरी की मूर्तियों के दस्तावेज
चोरी की गई नटराज की मूर्ति
- फोटो : अमर उजाला
वस्तुतः वाराणसी अपने मंदिरों, सांस्कृतिक धरोहरों, घाटों के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। इसे देखने के लिए हर साल लाखों देसी- विदेशी पर्यटक वाराणसी आते हैं। इन्हीं के साथ अंतरराष्ट्रीय अपराधी, तस्करों, आर्ट डीलर, हैकर, वकील आते हैं जिनकी नजर यहां के सांस्कृतिक धरोहरों पर रहती है।
दुनियाभर में चोरी की गई भारतीय मूर्तियों की निगरानी वाली संस्था इंडिया प्राइड प्रोजक्ट के मुताबिक भारत में मूर्तियों बड़े ही सुनियोजित तरीके से होती है। पहले अमेरिका, आस्ट्रेलिया और यूरोप के खरीदार, तस्कर, अंतरराष्ट्रीय आर्ट डीलर भारत आते हैं और उस मूर्ति की पहचान करते हैं जिसे चोरी किया जाना है।
इसके बाद भारत में मूर्ति चोर मंदिरों, म्यूजियम आदि से उनकी चोरी करते हैं। फिर इन मूर्तियों को हांगकांग ले जाया जाता है। हांगकांग में चोरी की गई मूर्ति का फर्जी दस्तावेज बनाया जाता है। इसके बाद मूर्ति को ब्रिटेन, अमेरिका, आस्ट्रेलिया और पश्चिमी यूरोप के देशों में भेजा जाता है।
अंत में आर्ट डीलर और नीलामी घर अरबो रुपये में मूर्तियों की नीलामी करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान अधिकारियों को पैसे खिलाये जाते हैं और लड़कियां तक सप्लाई की जाती हैं।