आजादी के समय रामनगर की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यहां के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का भी आजादी में बड़ा योगदान रहा है। कई बार उन्हें जेल जाना पड़ा। कई बार उन्हें जेले में यातनाएं मिली लेकिन आजादी की लड़ाई में वे पीछे नहीं हटे। भारत आजाद होने के बाद कई बार रामनगर आते थे तो यहां भी झंडा फहराते थे।
आजादी के बाद उन्हें उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव के रूप में नियुक्त किया गया। गोविंद वल्लभ पंत के मंत्रिमंडल में उन्हें पुलिस व परिवहन मंत्रालय सौंपा। परिवहन मंत्री के कार्यकाल में पहली बार महिला कंडटर्स की नियुक्ति की। पुलिस मंत्री होने के बाद उन्होंने भीड़ को नियंत्रण करने के लिए लाठी के बजाय पानी की बौछार के इस्तेमाल की शुरुआत करवाई।
छोटी राजकुमारी कृष्णा प्रिया ने कहा कि काशी नरेश डा. विभूति नारायण सिंह ने 15 अगस्त 1947 को रामनगर किला के झंडा गेट पर तिरंगा फहराया था। उन्होंने कहा कि आजादी के जश्न पूरे जोश ओ खरोस के साथ मनाया गया था। इसके बाद बतौर मुख्य अतिथि काशी नरेश हर 15 अगस्त को झंडा फहराने के कार्यक्रमों में जाते थे।
कई बार काशी नरेश बाहर झंडा फहराने चले जाते थे उस दौरान किले के कैप्टन झंडा फहराने के कार्यक्रम को देखते थे। इस कमी को पूरा करने के लिए मैंने 1968 से 1978 तक स्वतंत्रता दिवस पर झंडा फहराने के कार्यक्रम को संभाला। 15 अगस्त के कार्यक्रम में लोगों को संदेश देती थी।
1978 के बाद किसी कारण झंडा फहराने के कार्यक्रम में विराम लग गया। 2001 से मेरे छोटे भाई कुंवर अनंत नारायण सिंह ने झंडा फहराने की पुरानी परंपरा को शुरू किया। उनकी गैर मौजूदगी में उनके पुत्र या किला के कैप्टन झंडा फहराते हैं।
रामनगर के लक्ष्मण कुमार ने कहा कि किले पर सबकी निगाह रहती थी इस नाते कोई भी क्रांतिकारी किले में नहीं रहते थे। आसपास के जंगलों में रहकर वे अपनी रणनीति बनाते थे। हमारे बाबा बताते थे कि क्रांतिकारियों की मदद रामनगर के लोग करते थे। कुछ मदद किले से भी होते थे लेकिन वे सब चोरी छिपे होते थे।