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स्वतंत्रता दिवस विशेष: गौरवगाथा के जीवंत स्मारक हैं काशी विद्यापीठ और बीएचयू

Tue, 14 Aug 2018 10:34 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
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वाराणसी स्थित महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ और बीएचयू आजादी की गौरवगाथा के अमर नायक रहे हैं। यहां कभी स्वतंत्रता के लिए रणनीति बनी और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंका गया था। विद्यापीठ स्वर्णिम इतिहास का साक्षी तो रहा ही है, उस कथा में सशक्त किरदार भी निभाया था। इसी परिसर में महात्मा गांधी ने चरखे पर सूत काता था और इसी विद्यापीठ के छात्र चंद्रशेखर सीताराम तिवारी अमर क्रांति नायक आजाद थे। देशभक्ति इसकी पहचान रही है और समाज को नायक देना यहां की अटूट परंपरा। बीएचयू के इग्नू क्षेत्रीय केंद्र परिसर में गांधी चबूतरा पर बैठकर बापू ने 1942 में आह्वान किया था। 15 अगस्त 1947 में यहां झंडा फहराया गया था।  
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काशी विद्यापीठ से जुड़े हैं कई महापुरुषों के नाम 

- फोटो : अमर उजाला
काशी विद्यापीठ की स्थापना 10 फरवरी 1921 में बाबू शिव प्रसाद गुप्त और भगवान दास ने की थी। यह वो दौर था जब गुलामी की जंजीरें तोड़ने के लिए पूरा भारत कसमसा रहा था। ये छटपटाहट काशी के लोगों ने भी महसूस की। इसी उद्देश्य से उस वक्त शिव प्रसाद जी ने बिना किसी आर्थिक सहयोग के इस विश्वविद्यालय की स्थापना की। वेद के मंत्रों और कुरान की आयतों संग इस विश्वविद्यालय की नींव रखी गई। महात्मा गांधी ने खुद इसकी आधारशिला रखी थी। उस स्वर्णिम पल के साक्षी बने थे पंडित मोतीलाल नेहरू, मौलाना मोहम्मद अली, मौलाना अबुल कलाम आजाद। 
 

स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए थे छात्र

- फोटो : अमर उजाला
राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए स्वयंसेवक तैयार करने के उद्देश्य से स्थापित किए गए इस विश्वविद्यालय के शिक्षकों और विद्यार्थियों ने आजादी के आंदोलन में अहम भूमिका निभाई थी। भारत छोड़ो आंदोलन में इस विश्वविद्यालय में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई थीं। आलम ये था कि अगस्त क्रांति दिवस पर काशी विद्यापीठ में अंग्रेजों ने छापा मारा। विद्यार्थियों और शिक्षकों की गिरफ्तारी हुई। इनमें डॉ. संपूर्णानंद, आचार्य बीरबल सिंह, प्रो. राजाराम शास्त्री तक शामिल थे। 

गांधी जी ने चलाया था चरखा

महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ।
काशी विद्यापीठ से महात्मा गांधी का भी अनूठा रिश्ता रहा है। उन्हीं की प्रेरणा से इस विश्वविद्यालय की स्थापना की गई तो उन्होंने ही इसकी आधारशिला रखी। यही नहीं करीब सप्ताह भर यहां रहकर देश की आजादी के लिए रणनीति बनाई। इसी दौरान उन्होंने यहां सूत भी काता था। आज भी उनकी ये याद मानविकी संकाय में ‘बापू भवन’ के तौर पर पुष्पित पल्लवित हो रही है। 

यहीं के छात्र थे चंद्रशेखर आजाद

उम्र महज 14 साल, जिगर फौलाद सा और आंख में भारत माता की आजादी का सपना। शरीर पर जितने कोड़े बरसे, इस क्रांति नायक के इरादे और मजबूत होते गए। आजादी की गाथा के उस अमर क्रांतिकारी का नाम था चंद्रशेखर आजाद, जिसकी देशभक्ति की गाथा सुनने मात्र से सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है। 1921 में पढ़ाई छोड़कर बापू के असहयोग आंदोलन में शामिल होने वाले चंद्रशेखर आजाद इसी विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं। 
 

भारत माता का इकलौता मंदिर विद्यापीठ में

भारत माता मंदिर
सबसे दिलचस्प और गौरवान्वित करने वाला पहलू यह है कि इस विश्वविद्यालय के परिसर में भारत माता मंदिर है। यहां किसी देवी और देवता की नहीं बल्कि अखंड भारत माता की प्रतिमा है। इस भारत माता मंदिर का उद्घाटन भी महात्मा गांधी ने 1936 में किया। इसमें संगमरमर के पत्थरों से अखंड भारत को गणितीय सूत्रों के आधार पर उकेरा गया है। 
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बीएचयू के दीक्षांत समारोह में आए थे बापू

महात्मा गांधी
1942 में बीएचयू के दीक्षांत समारोह में बतौर मुख्य अतिथि महात्मा गांधी आए थे। इसके पहले 1920 में बापू ने यहां सभा कर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ छात्रों को आवाज उठाने को कहा था। इसके बाद 42 में आए और यहां ओजस्वी भाषण दिया था। यहां के छात्रों ने 1947 में कलेक्ट्रेट तक मार्च निकालकर झंडा फहराया था। 
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