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आईआईटी बीएचयू: मेघालय से काशी आकर बनाया बायो सेंसर, नौकरी छोड़ शुरू की एसएससी की तैयारी; बड़ा है सपना

Fri, 06 Nov 2026 10:19 PM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

मेघालय से काशी आकर एक युवती ने बायोसेंसर बनाया। इसके बाद नौकरी छोड़ एसएससी की तैयारी शुरू की। पिता दवा की दुकान चलाते हैं और मां घरों में ट्यूशन पढ़ाती हैं। पीएचडी धारक इस युवती को अपनी उपलब्धियों के लिए सर्वाधिक 12 मेडल मिले हैं। उसकी पांच खोजें बीमारियों की पहचान और उन्हें खत्म करने में मददगार साबित हो सकती हैं।
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आईआईटी बीएचयू के दीक्षांत समारोह। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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आईआईटी बीएचयू से बीटेक, एमटेक और पीएचडी की डिग्रियां पाने के बाद कोई वैज्ञानिक बनकर बायो सेंसर बना रहा तो कोई बड़ा पैकेज छोड़ एसएससी सीजेएल परीक्षा देने में जुट गया है। कुछ यूपीएससी कर आईएएस बनने की तैयारी पर निकल पड़े हैं। बाकी सिर्फ नौकरीपेशा ही बने रहकर देश को सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री में अग्रणी बनाने का सपना देख रहा है। 

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जिस छात्रा को सबसे ज्यादा 12 मेडल मिले उसके पिता दवा बेचते हैं और मां घरों में ट्यूशन पढ़ाती हैं। इसी तरह से एक कहानी मेघालय से मां, भाई और बहन के साथ पीएचडी डिग्री लेने आई बायोकेमिकल की पीएचडी छात्रा टपिका की है, जिसने पांच बड़े खोज किए। बताया कि पिछले पांच साल आईआईटी में रहकर उन्होंने पांच खोजें कीं, जिसे पेटेंट भी मिल चुका है। 

पर्यावरण के जहरीले तत्वों और बीमारियों को खत्म करने के लिए बायो सेंसर बनाया है। वहीं अब मेघालय के नॉर्थ ईस्ट इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल इंजीनियरिंग संस्थान में असिस्टेंट प्रोफेसर हो चुकी हैं। मां लोमलांग लुखार ने कहा, पिता साथ में नहीं थे तो पढ़ाई की जिम्मेदारी मेरे पर आ गई। मैंने अपनी बेटी को पढ़ाने की परमिशन दे दी। अब बिटिया वापस घर के पास ही पढ़ा रही है। गुजरात के राजकोट से आए जिल्का किशन कमलेशभाई ने बायोकेमिकल इंजीनियरिंग से एमटेक पूरा किया, लेकिन नौकरी नहीं ज्वाइन की। अब एसएससी की तैयारी में जुट गए हैं। 
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कहा, एसएससी से सेलेक्शन के बाद ही आगे किसी दूसरी परीक्षा के लिए आवेदन करूंगा। इसके बाद यूपीएससी की ओर रुख होगा। इंजीनियरिंग में भी स्कोप बहुत ज्यादा है लेकिन सिविल सेवा में हर जगह एक्सप्लोर करने का मौका मिलेगा। राजकोट घर पर ही रहकर तैयारी चल रही है। 

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कुछ अतिरिक्त नहीं पढ़ा : हरजस कौर
हरजस कौर ने कहा कि पिता की दवा की दुकान है। मां घरों में ट्यूशन पढ़ाती हैं। भाई पढ़ाई करते हुए मेरी बहुत मदद किया। मेरी तैयारी का आधार मेरे माता-पिता ने ही बनाया था। उसके बाद शिक्षकों और दोस्तों ने मदद की। वर्तमान में नौकरी कर रही हूं। पढ़ाई के दौरान कभी कुछ अतिरिक्त नहीं पढ़ा। इस चक्कर में पड़ी ही नहीं कि इतना पढ़ना है क्योंकि उससे आप पढ़ाई के काफी अंदर चले  जाओगे जहां से निकलना संभव नहीं।

  • गूगल में सॉफ्टवेयर इंजीनियर, भारत की तरक्की करूंगा नौकरी: गूगल में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर काम करना अलग अनुभव है जो कि काशी के घाटों से बिल्कुल अलग है, लेकिन उससे अच्छा नहीं। हमें सॉफ्टवेयर में  तरक्की करनी है, जिसमें भारत का भी विकास हो। - प्रतीक त्रिपाठी, बीटेक
  • नौकरी लगी है अच्छा लग रहा है : सात गोल्ड और दो कैश प्राइज मिला। हापुड़ से हूं। परिवार में सभी बिजनेस बैकग्राउंड से हैं। फिलहाल नौकरी लग चुकी है तो इसी में अच्छा लगने लगा है।  - तनिशा अग्रवाल, बीटेक
  • लंबे समय तक नौकरी करूंगा : मीशो कंपनी में प्लेसमेंट हो चुका है और वहां काम के कोई घंंटे नहीं गिनते, प्रोजेक्ट और क्वालिटी के आधार पर काम करना होता है। अब लंबे समय तक नौकरी में ही रहूंगा। पिता का हाथरस में कपड़े का बिजनेस है। - जतिन अग्रवाल, बीटेक
  • तमिलनाडु में डेटा साइंटिस्ट : फार्मास्यूटिकल इंजीनियरिंग विभाग से आईडीडी की उपाधि लेने तमिलनाडु से आई। पद्मनाभपुर में डेटा साइंटिस्ट हूं। पिता की प्राइवेट नौकरी है और मां गृहिणी हैं। —रत्ना के आईडीडी
  • सौर ऊर्जा से बनी बिजली कम नुकसान के साथ होगी इस्तेमाल : सौर ऊर्जा से बनी बिजली को कम से कम ऊर्जा नुकसान के साथ इस्तेमाल योग्य बनाया हूं। इसलिए पहली बार सोलर एनर्जी के लिए ग्रीन एनर्जी मेडल, कैश प्राइज और स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया। मध्य प्रदेश का रहने वाला हूं। - प्रखर नेमा, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग
  • सपने से कम नहीं मेडल जीतना : बंगाल के मालदा में घर है। सिरेमिक इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर काशी में गोल्ड मेडल किसी सपने के पूरा होने से कम नहीं है। अब बंगलूरू में ब्लैकफॉर्म कंपनी में काम रहा हूं। जॉब पर फोकस्ड हूं। पिता एनटीपीसी में सिविल कॉन्ट्रैक्टर हैं। - स्पंदन धर, एमटेक
  • रिसर्च असिस्टेंट बना : मटेरियल साइंस एंड टेक्नोलॉजी में कोर्स पूरा करने के बाद रिसर्च असिस्टेंट बन गया हूं और सेमी कंडक्टर डिवाइस पर काम शुरू कर दिया है। घर मुंबई में है और पिता टाटा पॉवर में कार्यरत हैं। - धनंजय जे नायर, आईडीडी
  • प्रोफेसर्स और दिल को किया फॉलो : डायरेक्टर्स गोल्ड मेडल पाऊंगा कभी सोचा ही नहीं था। मैंने तो सिर्फ प्रोफेसर्स को फॉलो किया है। मेरे पिता भी एक प्रोफेसर हैं और जब भी कुछ दिक्कत होती थी वो हमेशा मुझसे कहते थे अपने दिल को फॉलो करो। जो मिल रहा भगवान की देन है। 30 साल की उम्र के बाद पीएचडी करूंगा। एनालिस्ट हूं। - मेहुल कुमार राजकुमार

परदादा के सामने ही रसवैद्य पारे को बनाया था सोना

आईआईटी बीएचयू के दीक्षांत समारोह के बाद आदित्य बिड़ला ग्रुप के चेयरमैन कुमार मंगलम ने परिसर का भ्रमण किया। कुलपति और निदेशक के साथ अपने परदादा के बनवाए विश्वनाथ मंदिर पहुंचकर बाबा के दर्शन-पूजन किए। 

मंदिर के दानकर्ताओं की सूची को देखते हुए आगे बढ़े तो दीवारों पर लगे एक शिलापट्ट पर रुक गए। यहां पर पारा से सोना बनाने का सूत्र था। लिखा था कि उनके परिवार के घनश्याम दास बिड़ला के भाई युगल किशोर बिड़ला के सामने ही काशी के कृष्णपाल रसवैद्य ने पारा से सोना बनाया था जो लगभग 18 सेर का था और यह सोना पंजाब में सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा को दान किया गया था। युगल किशोर के साथ महात्मा गांधी के सचिव महादेव देसाई और गणेश दत्त भी थे। इस शिलापट्ट पर महायोगी रसायनाचार्य नागार्जुन का स्केच भी था। पारा से सोना बनाने की कला अब काशी या बीएचयू में नहीं है। 
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एक ही घंटे में नए, पुराने विश्वनाथ मंदिर में किए दर्शन
आदित्य बिड़ला ग्रुप के चेयरमैन  कुमार मंगलम बिड़ला शनिवार को एक ही घंटे में नए और पुराने दोनों विश्वनाथ मंदिर में दर्शन और पूजन किया। करीब एक बजे तक बीएचयू के विश्वनाथ मंदिर में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच रुद्राभिषेक किया। उसके बाद सीधे श्रीकाशी विश्वनाथ धाम पहुंचे। यहां पर बाबा का दर्शन-पूजन कर मंदिर अधिकारियों से बातचीत की। हर रोज आने वाले भक्तों की संख्या और बाकी व्यवस्थाओं को भी जाना। उनके साथ कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी, निदेशक प्रो. अमित पात्रा भी मौजूद रहे। 
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